क्या आप जानते हैं कि हिंदू पुराणों में एक ऐसी माता का उल्लेख है जिन्होंने प्रतिशोध की आग में जलते हुए अपने शत्रु को मारने के लिए तपस्या शुरू की, लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से वही संतान उनके शत्रु की मित्र और रक्षक बन गई? यह अद्भुत कथा है माता दिति और 49 मरुद्गणों की, जो श्रीमद्भागवत पुराण के छठे स्कंध में वर्णित है। यह कहानी हमें बताती है कि कैसे भक्ति और व्रत की शक्ति प्रतिशोध को प्रेम में बदल सकती है।
माता दिति कौन थीं?
माता दिति दैत्यों और असुरों की आदि माता मानी जाती हैं। वे प्रजापति दक्ष की पुत्री और महर्षि कश्यप की पत्नी थीं। कश्यप मुनि की अनेक पत्नियों में दो सबसे प्रमुख थीं – अदिति और दिति। जहां अदिति से देवताओं का जन्म हुआ, वहीं दिति से दैत्य वंश की उत्पत्ति हुई।
माता दिति के दो महान और पराक्रमी पुत्र थे – हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु। ये दोनों असुर अत्यंत बलशाली थे और तीनों लोकों में उनका आतंक फैला हुआ था। हिरण्याक्ष का वध भगवान विष्णु ने वराह अवतार में किया था, जबकि हिरण्यकशिपु का संहार नृसिंह अवतार में हुआ था।
प्रतिशोध की ज्वाला
अपने दोनों पुत्रों की मृत्यु से माता दिति अत्यंत व्यथित और क्रोधित हो गईं। उन्हें लगा कि देवराज इंद्र ने भगवान विष्णु की सहायता से उनके पुत्रों की हत्या करवाई है। मातृत्व की पीड़ा और प्रतिशोध की आग में जलते हुए, दिति ने संकल्प लिया कि वे ऐसे पुत्र को जन्म देंगी जो इंद्र का वध कर सके।
इस उद्देश्य से माता दिति ने अपने पति महर्षि कश्यप को प्रसन्न करने का निश्चय किया। उन्होंने मन, वचन और कर्म से कश्यप मुनि की सेवा करना शुरू कर दिया। कई महीनों तक निरंतर सेवा और समर्पण देखकर महर्षि कश्यप अत्यंत प्रसन्न हो गए और उन्होंने दिति से कहा, “हे प्रिये, मैं तुम्हारी सेवा से अति प्रसन्न हूं। तुम मुझसे कोई भी वर मांग सकती हो।”
पुंसवन व्रत का आदेश
जब दिति ने अपनी इच्छा प्रकट की कि उन्हें ऐसा पुत्र चाहिए जो अमर हो और इंद्र को मार सके, तो कश्यप मुनि अत्यंत दुखी और चिंतित हो गए। उन्हें समझ आ गया कि उन्होंने वचन देकर एक बड़ी भूल कर दी है। लेकिन मुनि अपने वचन से भी बंधे थे।
बुद्धिमान कश्यप मुनि ने एक उपाय सोचा। उन्होंने दिति को पुंसवन व्रत का पालन करने का आदेश दिया। यह व्रत एक वर्ष तक चलने वाला कठिन संस्कार था जिसमें अनेक नियमों का पालन करना होता था।
पुंसवन व्रत के मुख्य नियम:
- शुद्ध और सात्विक भोजन का सेवन
- प्रतिदिन स्नान और पूजा-अर्चना
- भोजन के बाद हाथ, पैर और मुख की शुद्धि
- सूर्यास्त से पहले सो जाना
- मन, वचन और कर्म से पवित्रता बनाए रखना
- भगवान विष्णु की आराधना और स्मरण
कश्यप मुनि ने चेतावनी दी, “यदि तुम इस व्रत का पूर्णतः पालन करोगी तो तुम्हारी इच्छा पूरी होगी। लेकिन यदि थोड़ी सी भी त्रुटि हुई, तो तुम्हारे पुत्र इंद्र के शत्रु नहीं बल्कि मित्र बन जाएंगे।”
इंद्र की चिंता और षड्यंत्र
जब देवराज इंद्र को माता दिति के व्रत और उनके संकल्प का पता चला, तो वे अत्यंत भयभीत हो गए। उन्हें अपने प्राणों का खतरा दिखाई देने लगा। इंद्र ने निश्चय किया कि वे किसी भी तरह दिति के व्रत में विघ्न डालेंगे।
इंद्र सेवक के वेश में माता दिति की सेवा में लग गए। वे हर समय उनके आसपास रहते और व्रत में किसी भी प्रकार की त्रुटि की प्रतीक्षा करते रहते। लगभग पूरा वर्ष बीत गया, लेकिन दिति ने अत्यंत सावधानी से व्रत का पालन किया।
वह निर्णायक क्षण
व्रत के अंतिम दिनों में एक संध्या का समय था। कठोर तपस्या और व्रत के कारण माता दिति अत्यंत थकी हुई थीं। भोजन करने के बाद, थकान के कारण वे अपने हाथ-पैर और मुख धोना भूल गईं और सूर्यास्त के समय ही सो गईं।
यह वही क्षण था जिसकी प्रतीक्षा इंद्र कर रहे थे। उन्होंने तुरंत अपना सूक्ष्म रूप धारण किया और दिति के गर्भ में प्रवेश कर गए। अपने दिव्य वज्र से इंद्र ने गर्भ को पहले सात भागों में विभाजित कर दिया।
49 मरुद्गण का जन्म
जब गर्भ के सात टुकड़े हो गए, तो प्रत्येक टुकड़े से एक जीवात्मा प्रकट हुई और रोने लगी। “मा रुद, मा रुद” (मत रोओ, मत रोओ) – इसी से इन देवताओं का नाम मरुत पड़ा।
इंद्र ने फिर से प्रत्येक भाग पर सात बार प्रहार किया। इस प्रकार 7 × 7 = 49 मरुतों का जन्म हुआ।
आश्चर्यजनक बात यह थी कि इंद्र के वज्र के प्रहार के बावजूद ये 49 शिशु जीवित रहे। न केवल जीवित रहे, बल्कि वे सभी दिव्य तेज से युक्त थे और असुर प्रवृत्ति के स्थान पर देव प्रवृत्ति वाले थे।
वे सभी इंद्र से बोले, “हे देवराज! आप हमें क्यों मार रहे हैं? हम तो आपके भाई हैं। हम आपके शत्रु नहीं, मित्र हैं। हमें मत मारिए।”
भगवान विष्णु की कृपा
यह चमत्कार भगवान विष्णु की कृपा और पुंसवन व्रत की महिमा का परिणाम था। यद्यपि दिति से व्रत में छोटी सी त्रुटि हुई थी, लेकिन उन्होंने लगभग पूरे वर्ष विष्णु भक्ति और व्रत का पालन किया था। इस भक्ति ने उनके हृदय को शुद्ध कर दिया था और उनकी संतान को देवताओं का स्वभाव प्रदान किया।
जैसे भगवान ने महाराज परीक्षित को अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से गर्भ में ही बचाया था, वैसे ही विष्णु भक्ति ने इन 49 बालकों को इंद्र के वज्र से बचा लिया।
माता दिति का परिवर्तन
जब माता दिति की नींद खुली और उन्होंने यह पूरा दृश्य देखा, तो उनका हृदय परिवर्तन हो चुका था। भक्ति और व्रत ने उनके मन से प्रतिशोध की आग बुझा दी थी। अब वे एक शुद्ध चित्त वाली माता बन चुकी थीं।
दिति ने इंद्र से कहा, “हे इंद्र! मैंने प्रतिशोध की आग में जलकर तुम्हें मारने के लिए यह व्रत किया था। परंतु भगवान विष्णु की भक्ति ने मुझे 49 ऐसी संतानें दी हैं जो शुद्ध चेतना वाले देवता हैं। ये सभी तुम्हारे भाई हैं। मैं तुम्हें आदेश देती हूं कि इन 49 भाइयों को अपने साथ स्वर्गलोक ले जाओ और इनका यथोचित सम्मान करो।”
मरुद्गण: वायु और तूफान के देवता
49 मरुत देवताओं को मरुद्गण या मरुतगण भी कहा जाता है। वैदिक साहित्य में इनका विशेष स्थान है। ये वायु और तूफान के देवता माने जाते हैं और इंद्र के प्रमुख सहयोगी हैं।
मरुतों की विशेषताएं:
- तेजस्वी योद्धा: सभी मरुत महान योद्धा हैं जो युद्ध में इंद्र की सहायता करते हैं
- वायु के नियंत्रक: ये वायु, तूफान और बादलों पर नियंत्रण रखते हैं
- स्वर्ण आभूषण: सभी मरुत स्वर्ण के आभूषणों और दिव्य शस्त्रों से सुसज्जित रहते हैं
- दिव्य वाहन: इनके पास दिव्य रथ हैं जो वायु की गति से चलते हैं
- संगीत प्रेमी: ये गायन और संगीत के भी प्रेमी हैं
ऋग्वेद में मरुतों की स्तुति में अनेक सूक्त हैं। उन्हें रुद्र के पुत्र भी कहा जाता है और वे भगवान इंद्र के साथ युद्धों में भाग लेते हैं।
इस कथा से मिलने वाली सीख
यह पौराणिक कथा हमें कई महत्वपूर्ण शिक्षाएं देती है:
1. भक्ति की महिमा: भगवान विष्णु की सच्ची भक्ति हृदय को शुद्ध करती है और बुरे विचारों को अच्छे विचारों में बदल देती है।
2. प्रतिशोध का परिणाम: प्रतिशोध की भावना से शुरू किया गया कार्य भी यदि भक्तिपूर्ण हो तो उसका परिणाम शुभ होता है।
3. व्रत और संकल्प की शक्ति: नियमों का पालन करते हुए किया गया व्रत अद्भुत शक्ति प्रदान करता है।
4. माता का हृदय: एक माता का हृदय प्रतिशोध से भी प्रेम में बदल सकता है जब उसे सही मार्ग मिल जाए।
5. दैवी योजना: जो कुछ भी होता है वह परमात्मा की योजना के अनुसार ही होता है। दिति ने इंद्र को मारने के लिए पुत्र चाहे, लेकिन भगवान ने उन्हें इंद्र के मित्र के रूप में दिए।
रोचक तथ्य
- मरुतों की संख्या विभिन्न पुराणों में अलग-अलग बताई गई है, लेकिन श्रीमद्भागवत में 49 का उल्लेख है
- कुछ वैदिक ग्रंथों में मरुतों को 27 या 33 भी बताया गया है
- मरुत शब्द संस्कृत के “मरुत” से आया है जिसका अर्थ है “वायु” या “पवन”
- ऋग्वेद में मरुतों के लिए लगभग 33 सूक्त समर्पित हैं
- मरुत देवताओं को आधुनिक विज्ञान में वायुमंडलीय शक्तियों का प्रतीक माना जा सकता है
निष्कर्ष
49 मरुतों की यह कथा हिंदू पुराणों की सबसे अद्भुत और प्रेरक कथाओं में से एक है। यह कहानी हमें बताती है कि कैसे भक्ति और धर्म का मार्ग शत्रुता को मित्रता में बदल सकता है। माता दिति जो प्रतिशोध की आग में जल रही थीं, भगवान विष्णु की कृपा से शांति और प्रेम की प्रतीक बन गईं।
आज भी 49 मरुत देवलोक में इंद्र के साथ निवास करते हैं और वायु, बादल और तूफान के नियंत्रक के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं। वे इस बात के जीवंत प्रमाण हैं कि दैवी इच्छा सर्वोपरि है और भक्ति की शक्ति असीमित है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: मरुत देवता कौन हैं और उनकी संख्या कितनी है?
उत्तर: मरुत वायु और तूफान के देवता हैं जो देवराज इंद्र के सहयोगी हैं। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार इनकी संख्या 49 है। ये माता दिति के पुत्र हैं और देवलोक में इंद्र के साथ निवास करते हैं।
प्रश्न 2: माता दिति ने पुंसवन व्रत क्यों किया?
उत्तर: माता दिति ने अपने दो पुत्रों हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु की मृत्यु के बाद इंद्र से प्रतिशोध लेने के लिए यह व्रत किया था। वे ऐसा पुत्र चाहती थीं जो इंद्र को मार सके। लेकिन भगवान विष्णु की भक्ति ने उनके हृदय को परिवर्तित कर दिया।
प्रश्न 3: इंद्र ने दिति के गर्भ में प्रवेश करके क्या किया?
उत्तर: जब दिति व्रत के नियमों में थोड़ी सी चूक कर बैठीं, तब इंद्र ने उनके गर्भ में प्रवेश करके अपने वज्र से गर्भ को पहले 7 भागों में और फिर प्रत्येक भाग को 7 भागों में विभाजित कर दिया, जिससे कुल 49 मरुत देवताओं का जन्म हुआ।
प्रश्न 4: मरुतों को यह नाम क्यों मिला?
उत्तर: जब इंद्र ने गर्भ को विभाजित किया तो नवजात शिशु रोने लगे। इंद्र ने उन्हें “मा रुद, मा रुद” (मत रोओ, मत रोओ) कहा। इसी से इनका नाम मरुत पड़ा। संस्कृत में “मरुत” का अर्थ वायु या पवन भी होता है।
प्रश्न 5: क्या मरुत देवता आज भी देवलोक में हैं?
उत्तर: हां, पौराणिक मान्यता के अनुसार सभी 49 मरुत देवता आज भी देवलोक में इंद्र के साथ निवास करते हैं। वे वायु, बादल और तूफान के नियंत्रक हैं और युद्ध में इंद्र के प्रमुख सहयोगी माने जाते हैं।
प्रश्न 6: पुंसवन व्रत क्या है और इसका उद्देश्य क्या था?
उत्तर: पुंसवन व्रत एक प्राचीन वैदिक संस्कार है जो गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य, विकास और शुभ गुणों के लिए किया जाता है। इसमें एक वर्ष तक शुद्धता, सात्विक आहार, नियमित पूजा-अर्चना और अन्य नियमों का पालन करना होता है। इस व्रत में भगवान विष्णु की आराधना प्रमुख है।
प्रश्न 7: इस कथा से हमें क्या सीख मिलती है?
उत्तर: यह कथा हमें सिखाती है कि भक्ति और धर्म का मार्ग प्रतिशोध को प्रेम में बदल सकता है। भगवान विष्णु की सच्ची भक्ति हृदय को शुद्ध करती है और बुरे विचारों को अच्छे में परिवर्तित कर देती है। यह दैवी योजना की महिमा का भी उदाहरण है।
यह कथा श्रीमद्भागवत पुराण के छठे स्कंध से ली गई है। हिंदू पुराणों की ऐसी ही और रोचक कथाओं के लिए हमारी वेबसाइट motivationmagicbox.in पर बने रहें।