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नरकासुर वध कथा: श्री कृष्ण और नरकासुर का महायुद्ध | दिवाली से जुड़ी पौराणिक कहानी

क्या आप जानते हैं कि दीपावली से एक दिन पहले मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी के पीछे कौन सी रहस्यमयी कथा छिपी है?

जब तीनों लोकों में अत्याचार का अंधकार छा गया था, जब देवता भी असहाय हो गए थे, और जब 16,000 निर्दोष स्त्रियां बंधन में थीं – तब भगवान श्री कृष्ण ने एक ऐसा युद्ध लड़ा जिसने धर्म की पुनर्स्थापना की। यह है नरकासुर वध की अद्भुत कथा, जो हमें सिखाती है कि कितना भी शक्तिशाली अत्याचारी क्यों न हो, उसका विनाश निश्चित है।

नरकासुर का जन्म और प्रारंभिक जीवन

श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, नरकासुर का जन्म अत्यंत दिव्य परिस्थितियों में हुआ था। वह भूदेवी (पृथ्वी देवी) और भगवान विष्णु के वराह अवतार का पुत्र था। भूमि से उत्पन्न होने के कारण उसे भौमासुर भी कहा जाता था।

भगवान विष्णु ने अपने पुत्र को प्रागज्योतिषपुर (वर्तमान असम क्षेत्र) का राजा बनाया। यह नगर अत्यंत समृद्ध और सुंदर था। परमदेव पिता और पुण्यात्मा माता की संतान होने के बावजूद, नरकासुर में क्रूरता के बीज छिपे हुए थे।

रोचक तथ्य:

प्रागज्योतिषपुर को “पूर्व की ज्योति का नगर” भी कहा जाता था, जो अपनी विद्या और संपन्नता के लिए प्रसिद्ध था।

बाणासुर की संगति – पतन की शुरुआत

प्रारंभ में नरकासुर ने कुछ समय तक अपने राज्य का सुचारू रूप से संचालन किया। परंतु समय के साथ उसकी क्रूरता बढ़ती गई। जब उसकी दुष्टता की ख्याति चारों ओर फैली, तो महाअसुर बाणासुर को भी इसकी जानकारी हुई।

बाणासुर भगवान शिव का परम भक्त था और उसके 1,000 भुजाएं थीं। दोनों की मित्रता हो गई और यहीं से नरकासुर के जीवन में अंधकार का प्रवेश हुआ। बाणासुर की संगति ने उसे और भी निर्मम और अत्याचारी बना दिया।

ब्रह्मा जी की तपस्या और अमरता का वरदान

बाणासुर ने नरकासुर को सलाह दी कि वह ब्रह्मा जी की घोर तपस्या करे ताकि वह अजेय बन सके। नरकासुर ने कठोर तपस्या की और ब्रह्मा जी प्रसन्न हो गए।

जब ब्रह्मा जी ने वरदान मांगने को कहा, तो चतुर नरकासुर बोला – “प्रभु, मैं जानता हूं आप मुझे पूर्ण अमरता का वरदान नहीं देंगे। इसलिए मैं यह वर मांगता हूं कि मेरी मृत्यु केवल मेरी माता के हाथों से ही हो।”

यह वरदान मांगते समय नरकासुर ने सोचा था कि एक माता कभी अपनी संतान का वध नहीं कर सकती। ब्रह्मा जी ने “तथास्तु” कहकर वह वरदान दे दिया।

दिलचस्प बात:

नरकासुर को यह नहीं पता था कि माता भूदेवी स्वयं अवतार लेकर उसके अत्याचारों को समाप्त करने आएंगी।

तीनों लोकों पर विजय – अत्याचार का साम्राज्य

वरदान प्राप्त करने के बाद नरकासुर ने सबसे पहले पृथ्वी के समस्त राज्यों पर आक्रमण कर दिया। उसकी अपार शक्ति और क्रूरता के सामने सभी राजाओं ने घुटने टेक दिए। पृथ्वी को जीतने के बाद उसकी नजर स्वर्गलोक पर पड़ी।

नरकासुर ने इंद्रलोक पर आक्रमण कर दिया और देवराज इंद्र को पराजित कर स्वर्ग से बाहर निकाल दिया। इतना ही नहीं, उसने देवमाता अदिति के अमृत कुंडल भी छीन लिए, जो अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली थे।

नरकासुर के प्रमुख अपराध:

  1. 16,000 महिलाओं का अपहरण: उसने विभिन्न राज्यों की 16,000 सुंदर स्त्रियों को बलपूर्वक अपने महल में कैद कर लिया।
  2. वरुण की छत्र-छाया का अपहरण: समुद्र देवता वरुण की दिव्य छत्र-छाया को भी चुरा लिया।
  3. मणिपर्वत पर अधिकार: कैलाश पर्वत के निकट स्थित मणिपर्वत को भी अपने अधिकार में ले लिया।
  4. ऋषि-मुनियों का उत्पीड़न: तपस्वियों और संतों को भी नहीं बख्शा।

पूरा ब्रह्मांड त्राहि-त्राहि कर रहा था। नरकासुर त्रिलोकविजयी बन चुका था।

देवमाता अदिति की प्रार्थना

जब परिस्थिति असहनीय हो गई, तो देवमाता अदिति सत्यभामा के पास पहुंचीं। सत्यभामा भगवान श्री कृष्ण की आठ प्रमुख पत्नियों में से एक थीं और सत्राजित की पुत्री थीं।

महत्वपूर्ण तथ्य:

सत्यभामा को भूदेवी का अवतार माना जाता है। यही कारण था कि केवल वही नरकासुर का वध कर सकती थीं।

सत्यभामा ने देवमाता अदिति की व्यथा सुनी और तुरंत भगवान कृष्ण से नरकासुर के विनाश की प्रार्थना की। इंद्र और अन्य देवताओं ने भी द्वारका पहुंचकर श्री कृष्ण से सहायता मांगी।

श्री कृष्ण का प्रस्थान – गरुड़ पर सवार

भगवान श्री कृष्ण को सब कुछ ज्ञात था। उन्होंने सबको आश्वासन दिया और सत्यभामा को साथ लेकर अपने दिव्य वाहन गरुड़ पर सवार होकर प्रागज्योतिषपुर की ओर प्रस्थान किया।

यह केवल एक युद्ध नहीं था, बल्कि धर्म की पुनर्स्थापना का संकल्प था। श्री कृष्ण जानते थे कि नरकासुर का वध उनके हाथों संभव नहीं है, लेकिन धर्म की योजना अनूठी थी।

महाप्रलयंकारी युद्ध – जब धरती कांप उठी

जब श्री कृष्ण और सत्यभामा प्रागज्योतिषपुर पहुंचे, तो भयंकर युद्ध छिड़ गया। नरकासुर ने सबसे पहले अपने महान सेनापति मुरा को युद्ध के लिए भेजा।

सेनापति मुरा का वध:

श्री कृष्ण ने क्षणभर में ही मुरा का वध कर दिया। इसी कारण श्री कृष्ण को “मुरारी” (मुरा का शत्रु) भी कहा जाता है।

मुरा के वध से क्रोधित नरकासुर ने अपने दिव्यास्त्र शतघ्नी (एक प्रकार का दिव्य वज्र) का प्रयोग किया, परंतु श्री कृष्ण ने उसे सहजता से नष्ट कर दिया।

युद्ध भयंकर होता गया। श्री कृष्ण ने कई घातक अस्त्र चलाए, लेकिन ब्रह्मा जी के वरदान के कारण सभी अस्त्र निष्प्रभावी हो गए।

निर्णायक क्षण:

अंत में नरकासुर ने अपने सबसे शक्तिशाली दिव्यास्त्र का प्रयोग किया जो सीधे श्री कृष्ण की छाती पर लगा और वे मूर्छित होकर गिर पड़े।

सत्यभामा का प्रहार – माता का न्याय

श्री कृष्ण को मूर्छित देखकर सत्यभामा क्रोध से भर गईं। उन्होंने तुरंत अपना दिव्य अस्त्र निकाला और नरकासुर की छाती पर सटीक प्रहार किया।

वह दिव्य बाण नरकासुर के शरीर को भेदता हुआ उसके हृदय में धंस गया। नरकासुर आश्चर्यचकित था – “यह कैसे संभव है? मैंने तो श्री कृष्ण के सभी अस्त्र निष्क्रिय कर दिए थे!”

सत्यभामा बिना यह जाने कि उनका अस्त्र लगा भी है या नहीं, तुरंत मूर्छित श्री कृष्ण की ओर दौड़ीं। तभी नरकासुर धरती पर गिर पड़ा।

सत्य का प्रकटीकरण – भगवान की लीला

नरकासुर जैसे ही धरती पर गिरा, उसने देखा कि श्री कृष्ण मुस्कुराते हुए खड़े हो गए हैं। सत्यभामा भी आश्चर्य से श्री कृष्ण को देखने लगीं।

श्री कृष्ण ने नरकासुर के पास आकर कहा – “देखो, यह सत्यभामा हैं और ये वास्तव में भूदेवी का ही अवतार हैं। तुम्हारी माता ने ही तुम्हें पराजित किया है।”

भगवान ने आगे कहा – “मैं तुम्हें कभी नहीं मार सकता था क्योंकि तुम्हें ब्रह्मा जी का वरदान था। केवल तुम्हारी माता ही तुम्हारा वध कर सकती थीं। भूदेवी ने तुम्हारे अत्याचारों को समाप्त करने के विशेष उद्देश्य से सत्यभामा के रूप में अवतार लिया। मैंने तो केवल मूर्छित होने का नाटक किया ताकि सत्यभामा तुम पर अस्त्र चलाएं।”

नरकासुर को अपनी भूल का एहसास हो गया। उसने अंतिम सांसों में अपनी माता और भगवान से क्षमा मांगी और वहीं प्राण त्याग दिए।

नरक चतुर्दशी – प्रकाश पर्व की स्थापना

नरकासुर के वध के बाद श्री कृष्ण ने 16,000 महिलाओं को मुक्त किया और उन्हें सम्मान के साथ उनके घर पहुंचाया। देवमाता अदिति के कुंडल वापस किए और देवराज इंद्र को पुनः स्वर्ग का अधिकार मिला।

इस महान विजय की खुशी में कार्तिक मास की कृष्ण चतुर्दशी को लोगों ने अपने घरों में दीप जलाए। तभी से नरक चतुर्दशी का पर्व मनाया जाता है, जो दीपावली से एक दिन पहले आता है।

पर्व का महत्व:

नरक चतुर्दशी को “छोटी दीपावली” या “रूप चतुर्दशी” भी कहते हैं। इस दिन प्रातःकाल तेल से स्नान करने की परंपरा है, जो पापों से मुक्ति का प्रतीक है।

वैष्णव अस्त्र का रहस्य

भागवत पुराण में एक रोचक प्रसंग और मिलता है। माता भूदेवी ने भगवान विष्णु से अपने पुत्र की रक्षा के लिए कोई दिव्य अस्त्र देने की प्रार्थना की थी।

तब विष्णु जी ने नरकासुर को वैष्णव अस्त्र का ज्ञान दिया था। नरकासुर ने यह अस्त्र अपने पुत्र भगदत्त को सौंप दिया।

महाभारत से संबंध:

यही भगदत्त महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर से लड़ा था और उसने कुरुक्षेत्र युद्ध में अर्जुन पर वैष्णव अस्त्र चलाया था। श्री कृष्ण ने स्वयं अपनी छाती पर वह अस्त्र ले लिया और उसे वैजयंती माला में परिवर्तित कर दिया।

इस कथा से मिलने वाली शिक्षाएं

  1. अहंकार का पतन: कितना भी शक्तिशाली व्यक्ति क्यों न हो, अहंकार और अत्याचार उसका विनाश करते हैं।
  2. संगति का प्रभाव: बाणासुर की संगति ने नरकासुर को पथभ्रष्ट किया। अच्छी संगति जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  3. माता का स्थान: माता सबसे बड़ी शक्ति है, वही संतान को जन्म देती है और आवश्यकता पड़ने पर उसे नियंत्रित भी करती है।
  4. धर्म की विजय: अंततः धर्म की ही विजय होती है, चाहे कितना भी समय लगे।
  5. नारी शक्ति: सत्यभामा के रूप में नारी शक्ति का महान उदाहरण मिलता है।

निष्कर्ष

नरकासुर वध की यह कथा हमें याद दिलाती है कि जीवन में चाहे कितनी भी शक्ति क्यों न हो, अगर वह अत्याचार के लिए प्रयोग की जाए तो विनाश निश्चित है। दीपावली का यह पर्व केवल रोशनी का उत्सव नहीं, बल्कि अंधकार पर प्रकाश की, अधर्म पर धर्म की, और अत्याचार पर न्याय की विजय का प्रतीक है।

जब हम नरक चतुर्दशी के दिन दीप जलाते हैं, तो हम यह संकल्प लेते हैं कि हम भी अपने जीवन से अंधकार, अहंकार और बुराई को दूर करेंगे।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: नरकासुर को भौमासुर क्यों कहा जाता था?

उत्तर: नरकासुर भूदेवी (पृथ्वी देवी) का पुत्र था, इसलिए उसे भौमासुर (भूमि का पुत्र) भी कहा जाता था। “भौम” शब्द भूमि या पृथ्वी से संबंधित है।

प्रश्न 2: श्री कृष्ण नरकासुर को क्यों नहीं मार सके?

उत्तर: नरकासुर को ब्रह्मा जी से वरदान मिला था कि उसकी मृत्यु केवल उसकी माता के हाथों से होगी। इसलिए श्री कृष्ण उसे नहीं मार सकते थे। सत्यभामा, जो भूदेवी का अवतार थीं, ने ही उसका वध किया।

प्रश्न 3: नरक चतुर्दशी कब मनाई जाती है?

उत्तर: नरक चतुर्दशी कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है, जो दीपावली से एक दिन पहले आती है। इसे छोटी दीपावली भी कहते हैं।

प्रश्न 4: सत्यभामा कौन थीं?

उत्तर: सत्यभामा भगवान श्री कृष्ण की आठ प्रमुख पत्नियों (अष्टभार्या) में से एक थीं और सत्राजित की पुत्री थीं। उन्हें माता भूदेवी का अवतार माना जाता है।

प्रश्न 5: प्रागज्योतिषपुर कहां स्थित था?

उत्तर: प्रागज्योतिषपुर वर्तमान में असम के गुवाहाटी क्षेत्र में स्थित था। यह प्राचीन काल में एक समृद्ध और शक्तिशाली नगर था।

प्रश्न 6: श्री कृष्ण को मुरारी क्यों कहा जाता है?

उत्तर: नरकासुर के सेनापति मुरा का वध करने के कारण भगवान कृष्ण को “मुरारी” (मुरा का शत्रु) कहा जाता है।

प्रश्न 7: नरकासुर ने कितनी महिलाओं का अपहरण किया था?

उत्तर: नरकासुर ने विभिन्न राज्यों से 16,000 महिलाओं का अपहरण करके उन्हें अपने महल में बंदी बना लिया था। श्री कृष्ण ने उन सभी को मुक्त करके सम्मान के साथ उनके घर पहुंचाया।

प्रश्न 8: नरकासुर के पुत्र भगदत्त का क्या हुआ?

उत्तर: भगदत्त महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर से लड़ा था। उसने कुरुक्षेत्र युद्ध में अर्जुन पर वैष्णव अस्त्र चलाया था, जिसे श्री कृष्ण ने अपनी छाती पर ले लिया था।

प्रश्न 9: नरक चतुर्दशी के दिन क्या करना चाहिए?

उत्तर: नरक चतुर्दशी के दिन प्रातःकाल तेल से स्नान करना, दीप जलाना, और पूजा-अर्चना करनी चाहिए। यह पापों से मुक्ति और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है।

प्रश्न 10: इस कथा का उल्लेख किस ग्रंथ में है?

उत्तर: नरकासुर वध की कथा श्रीमद्भागवत पुराण में विस्तार से वर्णित है। इसके अलावा कालिका पुराण में भी नरकासुर का उल्लेख मिलता है।

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