क्या आप जानते हैं कि शनिवार को हनुमान जी की पूजा क्यों की जाती है?
क्या आपने कभी सोचा है कि शनिदेव जैसे शक्तिशाली ग्रह देवता भी हनुमान जी के भक्तों से दूर क्यों रहते हैं? आज हम आपको एक ऐसी अद्भुत कथा सुनाने जा रहे हैं जो न केवल आपकी आस्था को मजबूत करेगी, बल्कि यह भी बताएगी कि क्यों शनिवार के दिन हनुमान जी की आराधना करना इतना शुभ माना जाता है। यह कथा साहस, भक्ति और दिव्य शक्ति का अनोखा संगम है।
शनिदेव: न्याय के देवता
हिंदू धर्म में शनिदेव को न्याय का देवता माना जाता है। सूर्यपुत्र शनिदेव की दशा मनुष्य के जीवन में साढ़े साती और ढैय्या के रूप में आती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, शनि की दशा मनुष्य के कर्मों का फल देती है। अच्छे कर्म करने वाले को शनि पुरस्कृत करते हैं, जबकि बुरे कर्म करने वालों को दंड देते हैं।
शनिदेव को सभी ग्रहों में सबसे न्यायप्रिय माना जाता है। उनकी वक्र दृष्टि से राजा भी रंक बन सकता है और रंक राजा। इसीलिए लोग शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए विभिन्न उपाय करते हैं, तेल चढ़ाते हैं और शनिवार का व्रत रखते हैं।
लंका में शनिदेव की कैद: पहली कथा
रावण का योग बल
त्रेता युग में जब रावण का पराक्रम अपने चरम पर था, तब एक घटना घटी जिसने शनिदेव और हनुमान जी के बीच एक अटूट बंधन स्थापित कर दिया। रावण केवल एक शक्तिशाली राजा ही नहीं, बल्कि एक महान योगी भी था। उसने अपनी तपस्या और योग विद्या से असीम शक्तियां प्राप्त कर ली थीं।
मेघनाद के जन्म का संयोग
जब रावण के पुत्र मेघनाद (इंद्रजीत) का जन्म हुआ, उस समय आकाश में शनिदेव का प्रभाव बहुत अधिक था। ज्योतिषियों ने रावण को बताया कि शनि ग्रह के इस प्रभाव के कारण मेघनाद के अमर होने का योग समाप्त हो गया है। यह सुनकर रावण को अत्यधिक क्रोध आया।
रावण ने अपने योग बल का प्रयोग करते हुए शनिदेव को आकाश से खींच लिया और उन्हें लंका में बंदी बना लिया। यह घटना शनिदेव के लिए अत्यंत अपमानजनक थी, लेकिन रावण की योग शक्ति इतनी प्रबल थी कि शनिदेव भी उससे मुक्त नहीं हो पा रहे थे।
हनुमान जी का आगमन और शनिदेव की मुक्ति
जब भगवान श्री राम की आज्ञा से हनुमान जी माता सीता को अंगूठी देने के लिए लंका पहुंचे, तो उन्होंने वहां एक अद्भुत दृश्य देखा। शनिदेव एक कारागार में बंधे हुए थे। करुणामय हनुमान जी ने शनिदेव से उनकी दशा का कारण पूछा।
शनिदेव ने विनम्रतापूर्वक कहा, “मैं शनिदेव हूं। रावण ने अपने योग बल से मुझे यहां कैद कर रखा है। कृपया मुझे इस बंधन से मुक्त करें।”
पवनसुत हनुमान जी ने तुरंत शनिदेव को रावण के बंधन से मुक्त कर दिया। अपनी मुक्ति से अत्यंत प्रसन्न होकर शनिदेव ने हनुमान जी से वरदान मांगने को कहा।
हनुमान जी का वरदान
हनुमान जी ने कहा, “हे सूर्यपुत्र, कलियुग में जो भी मेरा भक्त होगा और मेरी आराधना करेगा, आप उसे कभी अशुभ फल नहीं देंगे और न ही उन्हें कष्ट पहुंचाएंगे।”
शनिदेव ने प्रसन्नतापूर्वक यह वरदान स्वीकार कर लिया। तभी से शनिवार को हनुमान जी की पूजा की परंपरा आरंभ हुई और सभी हनुमान भक्तों पर उनकी कृपा बनी रहती है।
रावण के विनाश का कारण
कहा जाता है कि लंका से प्रस्थान करते समय शनिदेव ने लंका की ओर अपनी वक्र दृष्टि डाली थी। यही कारण था कि रावण और उसके पूरे कुल का अंत में विनाश हो गया। शनिदेव की यह दृष्टि रावण के पतन का एक महत्वपूर्ण कारण बनी।
समुद्र तट पर शनि और हनुमान का संवाद: दूसरी कथा
कलियुग का आरंभ
एक दूसरी प्रसिद्ध कथा के अनुसार, एक बार पवनपुत्र हनुमान जी समुद्र तट पर बैठकर अपने आराध्य प्रभु श्री राम का भजन कर रहे थे। उनकी भक्ति में इतनी तल्लीनता थी कि उन्हें बाहरी दुनिया का कोई ज्ञान नहीं था।
तभी वहां शनिदेव पधारे। उन्होंने घमंड से भरकर कहा, “हे हनुमान, अब कलियुग आरंभ हो गया है। इस युग में आपका शरीर दुर्बल है और मेरा शरीर बलवान हो गया है। मैं आपके शरीर पर साढ़े साती बनकर आ रहा हूं।”
हनुमान जी की विनम्रता
शनिदेव को यह ज्ञात नहीं था कि हनुमान जी श्री राम के परम भक्त थे और उनके शरीर पर किसी भी ग्रह दशा का प्रभाव नहीं पड़ता था। हनुमान जी ने अत्यंत विनम्रता से कहा, “हे शनिदेव, कृपया आप मुझे मेरे प्रभु श्री राम का स्मरण करने दें। मेरे शरीर और आत्मा पर मेरे प्रभु श्री राम के अलावा किसी का अधिकार नहीं है।”
परंतु शनिदेव अपने घमंड में नहीं माने। उन्होंने कहा, “पूरी सृष्टि पर मेरी दृष्टि है और आप इससे दूर नहीं रह सकते।”
साढ़े साती का रहस्य
जब शनिदेव नहीं माने, तब हनुमान जी ने पूछा, “हे शनिदेव, बताइए आप मेरे शरीर पर किस स्थान पर बैठना चाहते हैं?”
शनिदेव ने गर्व से कहा, “सुनो हनुमान, पहले ढाई वर्ष मैं मस्तक पर बैठकर बुद्धि को विचलित करता हूं। अगले ढाई वर्ष मैं मुख में प्रवेश कर मनुष्य की शांति और धन-संपत्ति का हरण करके उसे पूर्णतः दरिद्र बना देता हूं। और अंतिम ढाई वर्ष मैं पैरों में रहकर उसे भटकाता रहता हूं।”
विशाल शिलाओं का पाठ
यह कहकर शनिदेव आकर हनुमान जी के सिर पर बैठ गए। जिसके कारण हनुमान जी के सिर में खुजली होने लगी। हनुमान जी ने तुरंत अपने सिर पर एक विशाल पत्थर रख लिया।
यह देखकर शनिदेव घबरा गए और बोले, “यह आप क्या कर रहे हैं महाराज!”
हनुमान जी ने सहजता से उत्तर दिया, “मैं अपनी खुजली मिटा रहा हूं।”
ऐसा कहते हुए हनुमान जी ने एक और विशाल पत्थर अपने सिर पर रख लिया। शनिदेव का शरीर इन विशाल शिलाओं के बोझ से दबने लगा और उन्हें असहनीय पीड़ा होने लगी।
शनिदेव की प्रार्थना और वचन
शनिदेव ने अत्यंत कष्ट में हनुमान जी से प्रार्थना की, “कृपया आप इन विशाल शिलाओं को अपने सिर से नीचे उतारिए। मैं आपके शरीर के भीतर नहीं रह सकता। मैं आपसे याचना करता हूं। मैं आपको वचन देता हूं कि मैं आपको आगे से कभी पीड़ित नहीं करूंगा।”
हनुमान जी ने कहा, “हे सूर्यपुत्र, आज के बाद आप न तो किसी राम भक्त को और न ही मेरे भक्तों को कभी परेशान करेंगे।”
शनिदेव ने यह वचन दिया और हनुमान जी ने अपने सिर से पत्थरों की शिलाओं को नीचे उतार दिया।
तेल चढ़ाने की परंपरा का आरंभ
परंतु पत्थरों के नीचे दबे रहने के कारण शनिदेव के शरीर में बेहद पीड़ा हो रही थी। उन्होंने हनुमान जी से थोड़ा तेल अपने शरीर पर मालिश करने के लिए मांगा।
हनुमान जी ने उत्तर दिया, “मेरे पास अभी तो तेल नहीं है। लेकिन आज के बाद आपके दुष्ट प्रभावों से बचने के लिए भक्तजन आपको तेल चढ़ाकर ही आपको प्रसन्न करेंगे।”
इसी दिन से शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए तेल चढ़ाने की परंपरा आरंभ हुई। आज भी लोग शनिवार के दिन शनि मंदिर में तेल चढ़ाते हैं और दीपक जलाते हैं।
रोचक तथ्य और आध्यात्मिक महत्व
हनुमान जी की अद्भुत शक्तियां
- चिरंजीवी: हनुमान जी अष्ट चिरंजीवियों में से एक हैं और कलियुग में भी उनकी उपस्थिति मानी जाती है।
- पंचमुखी रूप: हनुमान जी का पंचमुखी रूप पांच शक्तियों का प्रतीक है जो सभी दिशाओं में रक्षा करता है।
- संकटमोचन: हनुमान जी को संकटमोचन कहा जाता है क्योंकि वे अपने भक्तों के सभी संकट हर लेते हैं।
शनिवार को हनुमान पूजा का महत्व
शनिवार को हनुमान जी की पूजा करने से शनि के दुष्प्रभाव से रक्षा होती है। इस दिन हनुमान चालीसा का पाठ करना विशेष फलदायी माना जाता है। लाल रंग के फूल, सिंदूर और चोला चढ़ाना शुभ होता है।
शनि और हनुमान का संबंध ज्योतिष में
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जिन लोगों की कुंडली में शनि का प्रकोप हो, उन्हें मंगलवार और शनिवार को हनुमान जी की आराधना करनी चाहिए। इससे शनि की साढ़े साती और ढैय्या के दुष्प्रभाव कम होते हैं।
हनुमान भक्ति के लाभ
- मानसिक शक्ति: हनुमान जी की भक्ति से मन में साहस और आत्मविश्वास बढ़ता है।
- रोग निवारण: नियमित हनुमान चालीसा पाठ से अनेक रोगों से मुक्ति मिलती है।
- शत्रु भय का नाश: हनुमान जी के भक्त को किसी भी शत्रु या बुरी शक्ति का भय नहीं रहता।
- संकटों से मुक्ति: जीवन में आने वाली सभी प्रकार की समस्याओं और संकटों से मुक्ति मिलती है।
हनुमान जी की आराधना की विधि
शनिवार को हनुमान जी की पूजा करने के लिए सूर्योदय से पहले उठें। स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। हनुमान जी की मूर्ति या चित्र के सामने दीपक जलाएं। लाल रंग के फूल, सिंदूर, चोला और लड्डू का भोग लगाएं। हनुमान चालीसा का पाठ करें और सुंदरकांड का पाठ करना और भी अधिक शुभ होता है।
निष्कर्ष
हनुमान जी और शनिदेव की यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति और समर्पण से बड़ी से बड़ी शक्ति भी प्रभावहीन हो जाती है। जो व्यक्ति पूर्ण निष्ठा से भगवान की आराधना करता है, उस पर किसी ग्रह-नक्षत्र का बुरा प्रभाव नहीं पड़ता।
शनिवार को हनुमान जी की पूजा करना केवल एक परंपरा नहीं है, बल्कि यह एक वैज्ञानिक और आध्यात्मिक सत्य पर आधारित है। जो व्यक्ति नियमित रूप से हनुमान जी की आराधना करता है, वह जीवन में आने वाली सभी बाधाओं को सरलता से पार कर लेता है।
आइए, हम सभी संकटमोचन हनुमान जी की शरण में जाएं और उनकी कृपा से अपने जीवन को सुखमय और समृद्ध बनाएं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. शनिवार को हनुमान जी की पूजा क्यों की जाती है?
शनिवार को हनुमान जी की पूजा इसलिए की जाती है क्योंकि हनुमान जी ने शनिदेव से वरदान प्राप्त किया था कि वे उनके भक्तों को कभी कष्ट नहीं देंगे। जब हनुमान जी ने शनिदेव को लंका से मुक्त कराया और बाद में उनका घमंड तोड़ा, तब से शनिवार को हनुमान पूजा की परंपरा आरंभ हुई। इस दिन हनुमान जी की आराधना करने से शनि के दुष्प्रभाव से रक्षा होती है।
2. शनि की साढ़े साती से बचने के लिए क्या उपाय करें?
शनि की साढ़े साती से बचने के लिए सबसे प्रभावी उपाय है मंगलवार और शनिवार को हनुमान जी की आराधना करना। प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें, शनिवार को शनि मंदिर में तेल चढ़ाएं, काले तिल का दान करें, और नियमित रूप से भगवान राम और हनुमान जी का स्मरण करें। सच्ची भक्ति और अच्छे कर्म से शनि के प्रकोप से मुक्ति मिलती है।
3. हनुमान चालीसा पाठ का सबसे अच्छा समय क्या है?
हनुमान चालीसा का पाठ सूर्योदय और सूर्यास्त के समय सबसे अधिक फलदायी माना जाता है। मंगलवार और शनिवार को इसका पाठ विशेष शुभ होता है। साथ ही, संकट के समय किसी भी समय हनुमान चालीसा का पाठ किया जा सकता है। नियमित रूप से प्रतिदिन एक निश्चित समय पर पाठ करना सबसे उत्तम होता है।
4. शनिदेव को तेल क्यों चढ़ाया जाता है?
जब हनुमान जी ने शनिदेव के शरीर पर भारी पत्थर रखे थे, तो उनका शरीर दब गया और उन्हें बहुत पीड़ा हुई। जब हनुमान जी ने पत्थर हटाए तो शनिदेव ने अपने शरीर की पीड़ा दूर करने के लिए तेल मांगा। तब से शनिदेव को तेल चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई। शनिवार को सरसों या तिल के तेल का दीपक जलाना और तेल दान करना शुभ माना जाता है।
5. क्या हनुमान जी के भक्तों पर शनि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता?
हनुमान जी ने शनिदेव से वचन लिया था कि वे उनके भक्तों और राम भक्तों को कभी कष्ट नहीं देंगे। इसलिए जो व्यक्ति सच्चे मन से हनुमान जी की भक्ति करता है, उस पर शनि का दुष्प्रभाव नहीं पड़ता या बहुत कम पड़ता है। परंतु यह ध्यान रखना चाहिए कि भक्ति निष्कपट और निरंतर होनी चाहिए। केवल दिखावे की भक्ति से कोई लाभ नहीं होता।
6. हनुमान जी को कौन सा प्रसाद सबसे प्रिय है?
हनुमान जी को लड्डू (विशेषकर बूंदी के लड्डू), पंचामृत, केले और गुड़ का प्रसाद अत्यंत प्रिय है। मंगलवार और शनिवार को लाल रंग के फूल, सिंदूर और लाल चोला चढ़ाना शुभ होता है। भोग लगाते समय शुद्ध मन और भक्ति भाव से प्रसाद अर्पित करना चाहिए।
7. शनि और हनुमान की कथा का क्या आध्यात्मिक संदेश है?
इस कथा का मुख्य संदेश यह है कि सच्ची भक्ति और समर्पण के आगे सभी बाधाएं और शक्तियां नतमस्तक हो जाती हैं। घमंड का नाश होना निश्चित है। हनुमान जी ने बिना हिंसा के, अपनी बुद्धि और शक्ति से शनिदेव का घमंड तोड़ा। यह हमें सिखाता है कि विनम्रता के साथ शक्ति का प्रयोग करना चाहिए और भगवान की शरण में रहने वाले को किसी का भय नहीं होता।
8. क्या शनि देव वास्तव में दुष्ट हैं?
नहीं, शनिदेव दुष्ट नहीं हैं। वे न्याय के देवता हैं और कर्मों के अनुसार फल देते हैं। जो अच्छे कर्म करता है, शनिदेव उसे पुरस्कृत करते हैं। जो बुरे कर्म करता है, उसे दंड मिलता है। शनिदेव केवल हमारे कर्मों का दर्पण हैं। उनसे डरने की नहीं, बल्कि उनका सम्मान करने और अच्छे कर्म करने की आवश्यकता है।
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुं लोक उजागर।।