क्या आप जानते हैं एक ऐसे शक्तिपीठ के बारे में जहां देवी के साथ राक्षस की भी पूजा होती है?
जी हाँ! यह अद्भुत स्थान है सप्तशृंगी देवी मंदिर, जो समुद्र तल से लगभग 4800 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां एक ओर गहरी खाइयां हैं तो दूसरी ओर हरे-भरे पर्वत। लेकिन सबसे रहस्यमयी बात यह है कि यह भारत का एकमात्र अर्ध शक्तिपीठ है, जहां मां भगवती को जीवित देवी माना जाता है और उनका चेहरा समय-समय पर अपने भाव बदलता है। आइए जानते हैं इस दिव्य शक्तिपीठ की संपूर्ण कथा और रहस्यों को।
सप्तशृंगी देवी मंदिर कहां स्थित है?
सप्तशृंगी देवी मंदिर महाराष्ट्र राज्य के नासिक जिले में स्थित एक अत्यंत पवित्र और रहस्यमयी शक्तिपीठ है। यह मंदिर वणी नामक छोटे से गांव के समीप, गोदावरी नदी के तट के पास सप्तश्रंग पर्वत श्रृंखला की ऊंचाइयों पर विराजमान है। इस पर्वत का नाम सप्तशृंगी इसलिए पड़ा क्योंकि इसमें सात सुंदर शिखर हैं, जो चारों दिशाओं में फैले हुए हैं और अपनी भव्यता से इस पूरे क्षेत्र को दिव्य आभा प्रदान करते हैं।
मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों को सैकड़ों सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, लेकिन जैसे-जैसे कोई ऊपर बढ़ता है, हवा में मां के जयकारों की गूंज और वातावरण में भक्ति का कंपन महसूस होता है। यह केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था, श्रद्धा और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम है।
सप्तशृंगी माता कौन हैं? देवी का स्वरूप और उत्पत्ति
देवी का दिव्य स्वरूप
सप्तशृंगी माता को आदि शक्ति का साक्षात स्वरूप माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, मां सप्तशृंगी महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती इन तीनों शक्तियों का संगम रूप हैं, जिन्हें त्रिगुणमयी देवी या ब्रह्म स्वरूपिणी के नाम से भी पूजा जाता है।
देवी की प्रतिमा की विशेषताएं:
- लगभग 8 फुट ऊंची स्वयंभू मूर्ति
- 18 भुजाएं जो शक्ति, करुणा और मातृत्व का प्रतीक हैं
- रक्त वर्ण (सिंदूरी रंग) की दिव्य आभा
- प्रत्येक भुजा में अलग-अलग दिव्य अस्त्र
देवी के हाथों में दिव्य अस्त्र
मां सप्तशृंगी की 18 भुजाओं में विभिन्न देवताओं द्वारा प्रदान किए गए अस्त्र हैं:
- भगवान शिव का त्रिशूल
- भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र
- वरुण देव का शंख
- अग्निदेव का दाहक तेज
- इंद्र का वज्र और घंटा
- यमराज का दंड
- ब्रह्मा जी का कमंडल
- सूर्य की किरणों का तेज
- विश्वकर्मा द्वारा निर्मित परशु और कवच
- समुद्र का कमलहार
- हिमालय का सिंह वाहन
यह सभी प्रतीक देवी की संपूर्ण ब्रह्मांडीय शक्ति को दर्शाते हैं।
ब्रह्म स्वरूपिणी देवी की उत्पत्ति कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी के कमंडल से एक पवित्र जलधारा प्रकट हुई, जिससे गिरिजा महानंदी का प्राकट्य हुआ। इसी गिरिजा स्वरूप में जब देवी ने पृथ्वी पर अवतार लिया, तो वे सप्तशृंगी देवी के नाम से पूजित हुईं। आज भी यह मंदिर गिरिजा नदी और गोदावरी के संगम क्षेत्र में स्थित है, जो देवी की उत्पत्ति की पुष्टि करता है।
महिषासुर वध की रोमांचक कथा
अधर्म का उदय
एक समय की बात है जब महिषासुर नामक एक शक्तिशाली राक्षस ने तीनों लोकों – स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल पर अपना अत्याचार फैलाना शुरू कर दिया। उसकी शक्ति इतनी प्रबल थी कि देवता भी उसके आगे असहाय हो गए। तब समस्त देवगण ब्रह्मा, विष्णु और महादेव की शरण में पहुंचे।
देवी का प्राकट्य
तीनों देवों ने अपने-अपने तेज और ऊर्जा को एकत्रित किया। उसी तेज पुंज से प्रकट हुईं मां दुर्गा, जो आगे चलकर मां सप्तशृंगी देवी के रूप में जानी गईं। मां ने सप्तश्रंग पर्वत को अपना निवास स्थान बनाया और यहीं महिषासुर के साथ भीषण युद्ध किया।
त्रिशूल का प्रहार और पर्वत में छेद
युद्ध में पृथ्वी कांप उठी, आकाश में बिजली की गर्जना हुई और पूरा ब्रह्मांड मां के तेज से आलोकित हो गया। अंततः मां ने अपने त्रिशूल से महिषासुर का वध किया। त्रिशूल का प्रहार इतना प्रचंड था कि जिस स्थान पर वह गिरा, वहां पर्वत की चोटी में एक बड़ा छेद बन गया, जो आज भी सप्तशृंगी पर्वत पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
अनोखी परंपरा: महिषासुर की पूजा
यह मंदिर की सबसे अनोखी विशेषता है कि यहां ना केवल मां की बल्कि महिषासुर की भी पूजा की जाती है। सप्तशृंगी मंदिर की सीढ़ियों के बाईं ओर एक छोटा सा मंदिर है, जहां महिषासुर का कटा हुआ सिर (पीतल से निर्मित भैंसे के सिर का प्रतीकात्मक स्वरूप) श्रद्धापूर्वक पूजा जाता है। यह इस बात का प्रतीक है कि जब बुराई का अंत होता है, तो उसे भी आत्मिक मुक्ति प्रदान की जाती है।
अर्ध शक्तिपीठ का रहस्य
यह शक्तिपीठ अपने आप में अनोखा है क्योंकि यह भारत का एकमात्र अर्ध शक्तिपीठ है। पौराणिक ग्रंथों में वर्णित है कि माता शक्ति के कुल 108 प्रमुख शक्तिपीठों में से कुछ अत्यंत पवित्र पीठ महाराष्ट्र की भूमि पर स्थित हैं।
साढ़े तीन शक्तिपीठ का रहस्य
माना जाता है कि संपूर्ण भारत में साढ़े तीन शक्तिपीठ ऐसे हैं जिन्हें अत्यंत जागृत माना गया है और इन सभी का निवास स्थान महाराष्ट्र है:
- तीन शक्तिपीठ पूर्ण शक्ति स्वरूप माने जाते हैं
- चौथा पीठ अर्थात सप्तशृंगी देवी मंदिर अर्ध शक्तिपीठ कहलाता है
यह “आधा” या आध्यात्मिक रूप से पूरक शक्ति स्थल माना जाता है, जो इसे और भी रहस्यमयी बनाता है।
जीवित देवी का चमत्कार
सप्तशृंगी देवी मंदिर की सबसे रहस्यमयी और चमत्कारी विशेषता यह है कि यहां विराजमान मां भगवती को जीवित देवी माना जाता है। भक्तों का दृढ़ विश्वास है कि मां की प्रतिमा केवल एक पत्थर की मूर्ति नहीं, बल्कि स्वयं शक्ति का साक्षात जीवंत रूप है।
चेहरे के भाव बदलते हैं
चैत्र नवरात्रि में: मां का चेहरा अत्यंत प्रसन्न और आनंदित मुद्रा में दिखाई देता है। उनकी आंखों में करुणा और ममता का भाव झलकता है, जैसे वे अपने भक्तों पर प्रेम की वर्षा कर रही हों।
अश्विन नवरात्रि में: मां का स्वरूप पूरी तरह बदल जाता है। उनके चेहरे पर गंभीरता, दृढ़ता और संकल्प का भाव उभर आता है, मानो वे संपूर्ण सृष्टि में फैले अधर्म को नष्ट करने के लिए तैयार हों।
मंदिर के पुजारी और स्थानीय श्रद्धालु बताते हैं कि नवरात्रों के दौरान मां के चेहरे पर रंग और भावों में प्राकृतिक परिवर्तन देखा गया है।
रामायण से जुड़ा संबंध
माना जाता है कि जब भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण वनवास के दौरान नासिक के तपोवन पहुंचे थे, तब उन्होंने इस पवित्र पर्वत पर चढ़कर मां सप्तशृंगी के दर्शन किए थे। कहा जाता है कि मां ने स्वयं भगवान राम को आशीर्वाद दिया था कि वे रावण पर विजय प्राप्त करेंगे। तभी से इस स्थान को विजय शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
संजीवनी पर्वत की अद्भुत कथा
एक और रोचक कथा है जो इस पर्वत को संजीवनी से जोड़ती है। महानुभावी लीला चरित्र ग्रंथ में उल्लेख मिलता है कि जब रामायण काल में मेघनाद (इंद्रजीत) के शक्ति अस्त्र से लक्ष्मण जी मूर्छित हो गए, तब हनुमान जी द्रोणागिरी पर्वत से संजीवनी लाने गए।
जब वे पर्वत लेकर लौट रहे थे, तो उसका एक भाग नीचे गिर गया और वही भाग आज सप्तशृंगी पर्वत के नाम से जाना जाता है। इसीलिए कहा जाता है कि इस पर्वत की मिट्टी और हवा में आज भी संजीवनी ऊर्जा मौजूद है, जो तन और मन दोनों को शक्ति प्रदान करती है।
मां सप्तशृंगी की स्वयंभू मूर्ति का प्राकट्य
देवी की स्वयंभू मूर्ति के प्राकट्य की कथा अत्यंत रोचक है। प्राचीन काल में एक भक्त पर्वत पर मधुमक्खियों का छत्ता तोड़ रहा था। तभी अचानक उस छत्ते की जगह से एक तेजस्वी आभा प्रकट हुई और मां सप्तशृंगी देवी की मूर्ति स्वयं प्रकट हुई।
यह मूर्ति किसी मानव द्वारा बनाई गई नहीं, बल्कि पर्वत की शिला से स्वयं उत्पन्न हुई थी। देवी की यह 8 फुट ऊंची प्रतिमा रक्त वर्ण की है, जिसका तेज आज भी भक्तों को सम्मोहित कर देता है। इसीलिए इस स्थान को स्वयंभू शक्तिपीठ कहा जाता है।
सात शिखर और 108 पवित्र कुंड
सप्तशृंगी का अर्थ है सात शिखरों से युक्त पर्वत। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मां सप्तशृंगी इन सातों पर्वतों की अधिष्ठात्री देवी हैं, जो प्रत्येक शिखर की रक्षा करती हैं। किंवदंती है कि इन पर्वतों के सातों शिखरों पर कभी सात ऋषि साधना में लीन रहते थे।
108 जलकुंडों का चमत्कार
इन सातों शिखरों की तलहटी में 108 पवित्र जलकुंड स्थित हैं। यह कुंड सदियों पुराने हैं और माना जाता है कि ये स्वयं मां की शक्ति से उत्पन्न जल स्रोत हैं। हर कुंड का पानी अलग-अलग स्वाद, तापमान और गुण लिए हुए है।
कुंडों की विशेषताएं:
- कहीं पानी मीठा है, कहीं थोड़ा खारा
- कहीं शीतल है तो कहीं थोड़ा गर्म
- औषधीय गुणों से भरपूर
- शरीर और मन की शुद्धि करने वाला
देवी दर्शन के तीन द्वार
सप्तशृंगी मंदिर की पवित्र गुफा में देवी दर्शन के लिए तीन प्रमुख प्रवेश द्वार हैं:
- शक्ति द्वार: मां की पराक्रमी और रक्षक मुद्रा के दर्शन
- सूर्य द्वार: मां का तेजस्वी और प्रकाशमय स्वरूप
- चंद्र द्वार: मां की शांत, करुणामयी और सौम्य छवि
भक्तों का विश्वास है कि इन तीनों द्वारों से दर्शन करने वाला व्यक्ति मां की तीनों शक्तियों – बल, तेज और शांति का आशीर्वाद प्राप्त करता है।
गोद भराई का अनोखा अनुष्ठान
सप्तशृंगी देवी मंदिर में मां की गोद भराई की अद्भुत परंपरा प्रचलित है। कहा जाता है कि जो भी स्त्री सच्चे मन से मां सप्तशृंगी की गोद भराई करती है, उसे शीघ्र ही संतान सुख की प्राप्ति होती है।
हर साल चैत्र और आश्विन नवरात्रि के दौरान यह पवित्र आयोजन विशेष श्रद्धा के साथ संपन्न होता है। इस दिन देवी को दुल्हन की तरह सजाया जाता है और भक्तगण नारियल, साड़ी, चुनरी, चूड़ी, सिंदूर, हल्दी, फूल और मिठाई अर्पित करते हैं।
प्रसाद: पुरन पोली
अनुष्ठान के बाद भक्तों को विशेष प्रसाद के रूप में महाराष्ट्र का प्रसिद्ध व्यंजन पुरन पोली वितरित किया जाता है, जिसे मां के आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है।
सप्तशृंगी देवी मंदिर की रोचक जानकारियां
- ऊंचाई: समुद्र तल से लगभग 4800 फुट
- स्थान: नासिक जिला, महाराष्ट्र, वणी गांव के समीप
- देवी का स्वरूप: 8 फुट ऊंची स्वयंभू प्रतिमा, 18 भुजाएं
- विशेषता: भारत का एकमात्र अर्ध शक्तिपीठ
- अनोखी परंपरा: महिषासुर की भी पूजा होती है
- प्राकृतिक सौंदर्य: 7 शिखर और 108 पवित्र कुंड
- चमत्कार: देवी का चेहरा समय-समय पर भाव बदलता है
- संबंध: रामायण काल और संजीवनी पर्वत से जुड़ा
- विशेष अनुष्ठान: गोद भराई की परंपरा
- त्रिशूल का निशान: पर्वत की चोटी में आज भी छेद दिखाई देता है
कैसे पहुंचें सप्तशृंगी देवी मंदिर
हवाई मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा नासिक (लगभग 60 किमी)
रेल मार्ग: निकटतम रेलवे स्टेशन मनमाड (लगभग 18 किमी) और नासिक रोड
सड़क मार्ग: मुंबई, पुणे और नासिक से नियमित बस सेवाएं उपलब्ध हैं। वणी गांव तक पहुंचने के बाद मंदिर तक पैदल या सीढ़ियों से जाना होता है।
दर्शन का सर्वोत्तम समय
सप्तशृंगी देवी मंदिर पूरे वर्ष खुला रहता है, लेकिन नवरात्रि (चैत्र और अश्विन) के दौरान यहां विशेष भीड़ होती है और अनेक विशेष अनुष्ठान होते हैं। इस समय मंदिर का वातावरण अत्यंत दिव्य और भक्तिमय होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. सप्तशृंगी देवी मंदिर क्यों प्रसिद्ध है?
सप्तशृंगी देवी मंदिर भारत का एकमात्र अर्ध शक्तिपीठ है जहां मां भगवती को जीवित देवी माना जाता है। यहां देवी का चेहरा समय-समय पर अपने भाव बदलता है और यह स्वयंभू शक्तिपीठ अनेक चमत्कारों के लिए प्रसिद्ध है।
2. अर्ध शक्तिपीठ का क्या अर्थ है?
अर्ध शक्तिपीठ का अर्थ है आधा या आध्यात्मिक रूप से पूरक शक्ति स्थल। भारत में साढ़े तीन जागृत शक्तिपीठ हैं, जिनमें से तीन पूर्ण हैं और सप्तशृंगी देवी मंदिर अर्ध शक्तिपीठ है। यह महाराष्ट्र में स्थित सभी जागृत शक्तिपीठों में से एक है।
3. सप्तशृंगी देवी मंदिर में महिषासुर की पूजा क्यों होती है?
यहां मां सप्तशृंगी ने महिषासुर का वध किया था। महिषासुर की पूजा इस बात का प्रतीक है कि जब बुराई का अंत होता है, तो उसे भी आत्मिक मुक्ति प्रदान की जाती है। यह मां की क्षमा और करुणा का प्रतीक है।
4. मां सप्तशृंगी देवी के कितने हाथ हैं?
मां सप्तशृंगी देवी की स्वयंभू प्रतिमा में 18 भुजाएं हैं। प्रत्येक भुजा में अलग-अलग देवताओं द्वारा प्रदान किए गए दिव्य अस्त्र हैं, जैसे त्रिशूल, चक्र, शंख, वज्र, दंड, कमंडल आदि।
5. सप्तशृंगी पर्वत का संजीवनी से क्या संबंध है?
किंवदंती है कि जब हनुमान जी द्रोणागिरी पर्वत से संजीवनी लेकर लौट रहे थे, तो उस पर्वत का एक भाग नीचे गिर गया, जो आज सप्तशृंगी पर्वत के नाम से जाना जाता है। इसलिए यहां की मिट्टी और हवा में संजीवनी ऊर्जा मौजूद मानी जाती है।
6. सप्तशृंगी देवी मंदिर में कौन से तीन द्वार हैं?
सप्तशृंगी मंदिर की गुफा में तीन प्रवेश द्वार हैं: शक्ति द्वार (रक्षक मुद्रा), सूर्य द्वार (तेजस्वी स्वरूप), और चंद्र द्वार (शांत करुणामयी रूप)। तीनों द्वारों से दर्शन करने पर मां की सभी शक्तियों का आशीर्वाद मिलता है।
7. गोद भराई का अनुष्ठान क्या है?
सप्तशृंगी देवी मंदिर में संतान प्राप्ति की मनोकामना के लिए मां की गोद भराई का विशेष अनुष्ठान होता है। भक्तगण नारियल, साड़ी, चुनरी, सिंदूर आदि अर्पित करते हैं और मां के आशीर्वाद से संतान सुख प्राप्त होता है।
8. 108 कुंडों की क्या विशेषता है?
सप्तशृंगी पर्वत पर 108 पवित्र जलकुंड हैं, जो स्वयं मां की शक्ति से उत्पन्न माने जाते हैं। हर कुंड का पानी अलग-अलग स्वाद, तापमान और औषधीय गुणों से भरपूर है। इन कुंडों में स्नान करने से शरीर और मन की शुद्धि होती है।
9. मां सप्तशृंगी का चेहरा कैसे बदलता है?
चैत्र नवरात्रि में मां का चेहरा प्रसन्न और आनंदित दिखाई देता है, जबकि अश्विन नवरात्रि में उनका स्वरूप गंभीर और तेजस्वी हो जाता है। मंदिर के पुजारी और भक्तों ने कई बार इस अद्भुत परिवर्तन को देखा है, जिससे यह सिद्ध होता है कि मां यहां जीवित रूप में विराजमान हैं।
10. क्या भगवान राम ने इस मंदिर में दर्शन किए थे?
हां, पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण ने वनवास के दौरान नासिक में रहते हुए इस पवित्र पर्वत पर चढ़कर मां सप्तशृंगी के दर्शन किए थे। मां ने उन्हें आशीर्वाद दिया था कि वे रावण पर विजय प्राप्त करेंगे।
मां सप्तशृंगी की आराधना से मिलने वाले लाभ
सप्तशृंगी देवी की उपासना करने से भक्तों को अनेक लाभ प्राप्त होते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि मां सप्तशृंगी त्रिगुणात्मक शक्ति हैं, इसलिए उनकी आराधना से जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता मिलती है।
धन और समृद्धि: महालक्ष्मी स्वरूप होने के कारण मां की कृपा से धन, ऐश्वर्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
विद्या और ज्ञान: महासरस्वती स्वरूप के कारण विद्यार्थियों को शिक्षा में सफलता, बुद्धि और ज्ञान का विकास होता है।
शक्ति और संरक्षण: महाकाली स्वरूप होने से भक्तों को शत्रुओं से रक्षा, बाधाओं का नाश और आत्मबल की प्राप्ति होती है।
संतान सुख: गोद भराई के अनुष्ठान से निःसंतान दंपत्तियों को संतान प्राप्ति का वरदान मिलता है।
रोग निवारण: मां के दर्शन और 108 कुंडों के पवित्र जल से शारीरिक और मानसिक रोगों से मुक्ति मिलती है।
मंदिर की दैनिक पूजा विधि
सप्तशृंगी देवी मंदिर में प्रतिदिन विशेष पूजा और आरती का आयोजन होता है। सुबह की आरती के समय जब सूर्य की पहली किरणें मां की प्रतिमा पर पड़ती हैं, तो पूरा मंदिर दिव्य प्रकाश से जगमगा उठता है।
प्रातःकालीन आरती: सुबह 5:30 बजे से 6:30 बजे तक मध्याह्न आरती: दोपहर 12:00 बजे संध्या आरती: शाम 7:00 बजे से 8:00 बजे तक
विशेष अवसरों पर महाआरती का भी आयोजन किया जाता है, जिसमें हजारों भक्त सम्मिलित होते हैं। नवरात्रि के दौरान तो यहां की भीड़ देखते ही बनती है।
मंदिर परिसर में अन्य देवी-देवता
सप्तशृंगी देवी मंदिर के मार्ग में कई अन्य मंदिर भी स्थित हैं:
भगवान गणेश का मंदिर: मां के दर्शन से पहले भक्त गणेश जी के मंदिर में विघ्नहर्ता की पूजा करते हैं, जो यात्रा की शुभ शुरुआत का प्रतीक है।
भगवान श्री राम का मंदिर: थोड़ा आगे श्री राम का मंदिर है, जो त्रेता युग की दिव्यता का आभास कराता है।
हनुमान जी का मंदिर: संजीवनी पर्वत की कथा से जुड़े होने के कारण यहां हनुमान जी का भी एक सुंदर मंदिर है।
महिषासुर का मंदिर: सीढ़ियों के बाईं ओर महिषासुर की पूजा का स्थान है, जो मां की क्षमा और करुणा का प्रतीक है।
सप्तशृंगी पर्वत की प्राकृतिक सुंदरता
सप्तशृंगी पर्वत केवल धार्मिक महत्व का स्थान नहीं है, बल्कि यह प्रकृति प्रेमियों के लिए भी स्वर्ग समान है। पर्वत की ऊंचाई से गोदावरी घाटी का नजारा अत्यंत मनमोहक है। घने जंगल, हरियाली से भरी पहाड़ियां, झरने और पक्षियों की मधुर आवाजें – यह सब मिलकर एक अद्भुत अनुभव प्रदान करते हैं।
मानसून के समय यह पूरा क्षेत्र हरियाली की चादर से ढक जाता है और बादलों के बीच से मंदिर का दृश्य स्वर्गीय लगता है। सर्दियों में यहां का मौसम सुहावना होता है और गर्मियों में भी पर्वत की ठंडी हवाएं राहत प्रदान करती हैं।
मंदिर यात्रा के लिए महत्वपूर्ण सुझाव
शारीरिक तैयारी: मंदिर तक पहुंचने के लिए सैकड़ों सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, इसलिए शारीरिक रूप से तैयार रहें।
उचित वस्त्र: आरामदायक और पारंपरिक वस्त्र पहनें। महिलाएं साड़ी या सलवार-कमीज पहन सकती हैं।
जूते-चप्पल: आरामदायक जूते या चप्पल पहनें क्योंकि लंबी चढ़ाई है।
पानी और भोजन: मार्ग में पानी और हल्का भोजन साथ रखें। मंदिर परिसर में भी भोजन की व्यवस्था है।
सुबह जल्दी पहुंचें: भीड़ से बचने के लिए सुबह जल्दी पहुंचना बेहतर है।
मौसम की जानकारी: मानसून में फिसलन हो सकती है, इसलिए सावधानी बरतें।
श्रद्धा और भक्ति: सबसे महत्वपूर्ण है सच्ची श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ मां के दर्शन करें।
स्थानीय लोगों की मान्यताएं और अनुभव
स्थानीय लोग मां सप्तशृंगी को अपनी कुलदेवी मानते हैं और उनके प्रति अगाध श्रद्धा रखते हैं। वे बताते हैं कि मां ने कई बार चमत्कार दिखाए हैं:
एक वृद्ध भक्त की कथा: एक बार एक वृद्ध भक्त सीढ़ियां चढ़ते समय थक गया और उसने मां से प्रार्थना की। कहते हैं उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे कोई उसे सहारा दे रहा है और वह आसानी से ऊपर पहुंच गया।
रोगी की चमत्कारी स्वस्थता: एक महिला जो गंभीर रोग से पीड़ित थी, उसने मां के दर्शन किए और 108 कुंडों के जल से स्नान किया। कुछ ही समय में वह पूरी तरह स्वस्थ हो गई।
संतान प्राप्ति: अनगिनत दंपत्ति हैं जिन्होंने मां की गोद भराई के बाद संतान सुख प्राप्त किया है। मंदिर में इनके नाम और प्रार्थनाओं के साक्ष्य मिलते हैं।
मंदिर का इतिहास और पुनर्निर्माण
यद्यपि देवी की स्वयंभू मूर्ति सदियों पुरानी है, मंदिर का वर्तमान स्वरूप विभिन्न कालों में विकसित हुआ है। मराठा शासकों ने इस मंदिर के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। पेशवा काल में मंदिर का जीर्णोद्धार और विस्तार किया गया।
आधुनिक समय में भी मंदिर प्रबंधन द्वारा भक्तों की सुविधा के लिए कई सुधार किए गए हैं। सीढ़ियों को मजबूत बनाया गया है, रोशनी की व्यवस्था की गई है और सुरक्षा के इंतजाम किए गए हैं।
नवरात्रि का विशेष महत्व
सप्तशृंगी देवी मंदिर में नवरात्रि का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। चैत्र और अश्विन – दोनों नवरात्रों में यहां लाखों श्रद्धालु आते हैं।
नवरात्रि के नौ दिनों में:
- प्रतिदिन विशेष पूजा और हवन का आयोजन
- देवी की विभिन्न स्वरूपों में आराधना
- कन्या पूजन और भंडारे का आयोजन
- भजन-कीर्तन और जागरण
- विजयादशमी पर विशेष उत्सव
इस दौरान पूरा पर्वत भक्ति और उल्लास से गूंजता रहता है। रात में जब मंदिर में दीपों की रोशनी होती है, तो दूर से देखने पर ऐसा लगता है जैसे पर्वत ही दीपमाला से सज गया हो।
आध्यात्मिक महत्व और साधना
सप्तशृंगी पर्वत अनेक साधकों और संतों की तपोभूमि रही है। यहां की दिव्य ऊर्जा साधना के लिए अत्यंत अनुकूल मानी जाती है। कई संत यहां ध्यान और साधना करते हैं।
तांत्रिक परंपरा में सप्तशृंगी देवी की विशेष महत्ता है। कहा जाता है कि यहां मंत्र साधना और शक्ति उपासना का विशेष फल मिलता है। हालांकि, साधना केवल योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही करनी चाहिए।
मंदिर से जुड़े अन्य रोचक तथ्य
108 की संख्या का महत्व: मंदिर में 108 कुंड हैं। यह संख्या हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र मानी जाती है। 108 मोतियों की माला, 108 नाम, 108 उपनिषद – सभी में यही संख्या है।
पर्वत में छेद: महिषासुर वध के समय त्रिशूल के प्रहार से बना छेद आज भी पर्वत की चोटी पर मौजूद है। यह प्राकृतिक चमत्कार है या दैवीय, यह रहस्य बना हुआ है।
जीवित देवी: विश्व में कुछ ही मंदिर हैं जहां देवी को जीवित माना जाता है। सप्तशृंगी देवी उनमें से एक हैं।
त्रिगुणात्मक स्वरूप: एक ही देवी में तीनों महाशक्तियों का समावेश – यह विशेषता बहुत कम शक्तिपीठों में पाई जाती है।
मंदिर के आसपास के दर्शनीय स्थल
वणी गांव: यह एक सुंदर और शांत गांव है जहां पारंपरिक महाराष्ट्रीयन संस्कृति की झलक मिलती है।
गोदावरी नदी: पवित्र गोदावरी नदी यहां से कुछ ही दूरी पर है, जहां भक्त स्नान करते हैं।
नासिक: नासिक शहर जो कुंभ मेले के लिए प्रसिद्ध है, यहां से 60 किमी दूर है। वहां त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग और अन्य धार्मिक स्थल हैं।
पंचवटी: यह वह स्थान है जहां भगवान राम ने वनवास के दौरान निवास किया था।
भक्तों के अनुभव
मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट और विभिन्न मंचों पर हजारों भक्तों ने अपने अनुभव साझा किए हैं:
“जब मैंने मां के दर्शन किए, तो मेरी आंखों में अनायास ही आंसू आ गए। ऐसा लगा जैसे मां मुझसे बात कर रही हों।” – एक भक्त
“मैं और मेरी पत्नी 10 साल से संतान के लिए प्रयासरत थे। मां की गोद भराई के एक साल बाद हमें बेटे की प्राप्ति हुई। यह मां का चमत्कार ही है।” – मुंबई से आए एक दंपत्ति
“नवरात्रि के दौरान जब मैंने मां के दर्शन किए, तो उनका चेहरा सचमुच अलग दिख रहा था – बहुत तेजस्वी और शक्तिशाली। यह जीवन का अविस्मरणीय अनुभव था।” – एक युवती
निष्कर्ष
सप्तशृंगी देवी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह आस्था, श्रद्धा, प्रकृति और चमत्कारों का अद्भुत संगम है। यहां की हर चट्टान, हर कुंड, हर सीढ़ी में मां की दिव्य शक्ति का अनुभव होता है।
सात शिखरों वाला यह पवित्र पर्वत, 108 पवित्र कुंड, स्वयंभू देवी की प्रतिमा, जीवित देवी का चमत्कार, महिषासुर की पूजा की अनोखी परंपरा, संजीवनी पर्वत से जुड़ा इतिहास और रामायण काल का संबंध – ये सभी विशेषताएं सप्तशृंगी देवी मंदिर को भारत के सबसे रहस्यमयी और पवित्र शक्तिपीठों में से एक बनाती हैं।
जो व्यक्ति एक बार यहां आता है, वह मां की कृपा से खाली हाथ नहीं लौटता। मां सप्तशृंगी अपने भक्तों को धन, विद्या, शक्ति, संतान, स्वास्थ्य और शांति – सभी का वरदान देती हैं। इसलिए यदि आपको कभी महाराष्ट्र जाने का अवसर मिले, तो एक बार अवश्य मां सप्तशृंगी के दर्शन करें और उनकी दिव्य शक्ति का अनुभव करें।
जय माता सप्तशृंगी! जय महाशक्ति!
नोट: यह जानकारी पौराणिक कथाओं, स्थानीय मान्यताओं और धार्मिक ग्रंथों पर आधारित है। भक्ति और श्रद्धा व्यक्तिगत आस्था का विषय है।