क्या आप जानते हैं कि भगवान शिव के आठ रहस्यमय रूप हर दिशा से हमारी रक्षा करते हैं? जब ब्रह्मा जी ने अहंकारवश भगवान शिव का अपमान किया, तो महादेव के क्रोध से प्रकट हुए कालभैरव ने ब्रह्मा जी का पांचवां सिर काट दिया। यह घटना भैरव की उत्पत्ति की सबसे प्रसिद्ध कथा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भैरव केवल एक नहीं, बल्कि आठ प्रमुख रूपों में विद्यमान हैं? ये अष्ट भैरव न केवल शक्तिपीठों के रक्षक हैं, बल्कि अष्ट दिशाओं के स्वामी भी हैं।
अष्ट भैरव: शिव की दिव्य सेना के सेनापति
हिंदू धर्मग्रंथों में भैरव को भगवान शिव का सबसे प्रिय गण और रुद्र अवतार माना गया है। शिव पुराण और स्कंद पुराण में अष्ट भैरवों का विस्तृत वर्णन मिलता है। ये आठ भैरव ब्रह्मांड की आठ दिशाओं की रक्षा करते हैं और प्रत्येक भैरव की अलग शक्तियां, वाहन, दिशा और विशेष अधिकार क्षेत्र है।
तांत्रिक परंपरा में भैरव को काल के नियंत्रक माना जाता है। ‘भैरव’ शब्द तीन अक्षरों से बना है – भ (सृष्टि), र (पालन) और व (संहार), जो त्रिदेवों की शक्तियों का प्रतीक है। रात्रि के देवता माने जाने वाले भैरव माता भवानी के सबसे शक्तिशाली अनुचर हैं।
रोचक तथ्य यह है कि अष्ट भैरवों में से सात के प्रमुख मंदिर तमिलनाडु में स्थित हैं, जबकि रुरु भैरव का मंदिर वाराणसी में है। यह तमिलनाडु को भैरव उपासना का प्रमुख केंद्र बनाता है।
1. असितांग भैरव – पूर्व दिशा के रक्षक
असितांग भैरव का शरीर घने काले रंग का है, इसलिए इन्हें ‘असित’ (काला) कहा जाता है। इनकी तीन दिव्य आंखें हैं जो त्रिकाल दर्शी हैं। इनके गले में मुंडमाला शोभायमान रहती है और इनका मुख्य अस्त्र भी कपाल है।
विशेष शक्तियां: असितांग भैरव की उपासना से साधक में कलात्मक प्रतिभा का विकास होता है। कलाकार, संगीतकार, नर्तक और रचनात्मक क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए इनकी आराधना विशेष फलदायी है।
- पत्नी: ब्राह्मी
- वाहन: हंस (पवित्रता और ज्ञान का प्रतीक)
- दिशा: पूर्व
- मंदिर स्थान: सत्थानाथर और कंदियेश्वर, तमिलनाडु
- नक्षत्र: पुनर्वसु
- रत्न: पुखराज (पीला नीलम)
2. रुरु भैरव (गुरु भैरव) – दक्षिण-पूर्व दिशा के स्वामी
रुरु भैरव को गुरु भैरव भी कहा जाता है और इनका स्वरूप अत्यंत प्रभावशाली और आकर्षक है। इनके चार हाथों में कुल्हाड़ी, पात्र, तलवार और कपाल सुशोभित रहते हैं। इनकी कमर में सर्प लिपटा रहता है जो कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक है।
विशेष शक्तियां: रुरु भैरव सर्व विद्या के दाता हैं। शिक्षा, ज्ञान, बुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति के लिए इनकी पूजा अद्वितीय फल देती है। छात्रों और ज्ञान पिपासुओं के लिए ये विशेष कृपालु हैं।
- पत्नी: महेश्वरी
- वाहन: नंदी (बैल)
- दिशा: दक्षिण-पूर्व (आग्नेय कोण)
- मंदिर स्थान: हनुमान घाट, वाराणसी, उत्तर प्रदेश
- नक्षत्र: कृत्तिका
- रत्न: माणिक्य (रूबी)
रोचक तथ्य: काशी में रुरु भैरव का मंदिर होने से वाराणसी को ‘भैरव क्षेत्र’ भी कहा जाता है।
3. चंड भैरव – दक्षिण दिशा के रक्षक
चंड का अर्थ है उग्र और प्रचंड। चंड भैरव का रंग श्वेत है और इनकी भी तीन नेत्र हैं। इनके चार हाथों में तलवार, पात्र, बाण और धनुष विराजमान रहते हैं।
विशेष शक्तियां: शत्रु पराजय और सर्वक्षेत्र में सफलता प्राप्ति के लिए चंड भैरव की उपासना सर्वोत्तम है। व्यापार, नौकरी, प्रतियोगिता और कोर्ट-कचहरी के मामलों में ये विजय दिलाते हैं।
- पत्नी: कौमारी
- वाहन: मयूर (मोर)
- दिशा: दक्षिण
- मंदिर स्थान: वैदीश्वरन कोइल, तमिलनाडु
- नक्षत्र: मृगशिरा
- रत्न: मूंगा (प्रवाल)
4. क्रोध भैरव – दक्षिण-पश्चिम दिशा के अधिपति
क्रोध भैरव का वर्ण नीला है और इनका वाहन गरुड़ है। भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ पर विराजमान ये भैरव शिव-विष्णु की एकता के प्रतीक हैं। इनकी तीन आंखें हैं जो त्रिकालज्ञान का प्रतिनिधित्व करती हैं।
विशेष शक्तियां: जीवन की समस्त कठिनाइयों से मुक्ति और आने वाली चुनौतियों का सामना करने की शक्ति प्रदान करते हैं। संकटमोचन के रूप में इनकी पूजा विशेष फलदायी है।
- पत्नी: वैष्णवी
- वाहन: गरुड़
- दिशा: दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य कोण)
- मंदिर स्थान: तिरुवनलूर, तमिलनाडु
- नक्षत्र: रोहिणी
- रत्न: मोती
5. उन्मत्त भैरव – पश्चिम दिशा के स्वामी
उन्मत्त भैरव का पूरा शरीर पीले रंग का है और ये अश्व पर सवार रहते हैं। अन्य भैरवों की तुलना में इनका स्वरूप अपेक्षाकृत शांत और सौम्य माना जाता है।
विशेष शक्तियां: नकारात्मक विचारों, मानसिक अशांति और डिप्रेशन से मुक्ति दिलाते हैं। मन की शांति और सकारात्मक ऊर्जा के लिए इनकी आराधना लाभकारी है।
- पत्नी: वाराही
- वाहन: अश्व (घोड़ा)
- दिशा: पश्चिम
- मंदिर स्थान: देवराव गांव (काशी के निकट)
- नक्षत्र: उत्तराभाद्रपद
- रत्न: नीलम
6. कपाल भैरव – उत्तर-पश्चिम दिशा के रक्षक
कपाल भैरव का स्वरूप अत्यंत तेजस्वी है और ये गजराज (हाथी) पर विराजमान रहते हैं। इनके चार भुजाएं हैं – दाहिने दो हाथों में त्रिशूल और तलवार, बाएं दो हाथों में शस्त्र और पात्र।
विशेष शक्तियां: कानूनी समस्याओं से मुक्ति और अटके हुए कार्यों की सिद्धि के लिए कपाल भैरव की पूजा अत्यंत प्रभावी है। संपत्ति विवाद और न्यायिक मामलों में ये सहायक हैं।
- पत्नी: ऐंद्री (इंद्राणी)
- वाहन: ऐरावत (हाथी)
- दिशा: उत्तर-पश्चिम (वायव्य कोण)
- मंदिर स्थान: तिरुविदैमरुदुर, तमिलनाडु
- नक्षत्र: भरणी
- रत्न: हीरा
7. संहार भैरव – उत्तर-पूर्व दिशा के अधिपति
संहार भैरव का संपूर्ण शरीर रक्त वर्ण (लाल) का है। ये दिगंबर रूप में रहते हैं और इनके सिर पर लाल कपाल विराजमान रहता है। इनकी तीन आंखें हैं और शरीर पर सर्प लिपटा रहता है।
विशेष शक्तियां: समस्त कष्टों से मुक्ति और पापों का नाश करते हैं। गंभीर रोग, कर्ज और शत्रु बाधा से छुटकारा पाने के लिए इनकी उपासना करनी चाहिए।
- पत्नी: चंडी
- वाहन: श्वान (कुत्ता)
- दिशा: उत्तर-पूर्व (ईशान कोण)
- मंदिर स्थान: तिरुवेनकाडु, तमिलनाडु
- नक्षत्र: रेवती
- रत्न: गोमेद
विशेष: कुत्ता भैरव का सबसे प्रिय प्राणी है, इसलिए भैरव की पूजा में कुत्तों को भोजन कराना अत्यंत शुभ माना जाता है।
8. भीषण भैरव – उत्तर दिशा के स्वामी
भीषण भैरव अष्ट भैरवों में अंतिम और अत्यंत शक्तिशाली हैं। इनकी तीन आंखें और चार भुजाएं हैं। इनके हाथों में कमल पुष्प, त्रिशूल, पात्र और तलवार विद्यमान रहते हैं।
विशेष शक्तियां: भूत-प्रेत बाधा, नकारात्मक ऊर्जा और तांत्रिक प्रयोगों से रक्षा करते हैं। अपस्मार (मिर्गी) और मानसिक विकारों से मुक्ति दिलाते हैं।
- पत्नी: चामुंडा
- वाहन: सिंह
- दिशा: उत्तर
- मंदिर स्थान: रामेश्वरम, तमिलनाडु
- नक्षत्र: स्वाति
- रत्न: पन्ना
अष्ट भैरव की उपासना विधि
भैरव की पूजा मुख्यतः रात्रि में की जाती है, विशेषकर अष्टमी और चतुर्दशी तिथि को। काली मिर्च, सरसों का तेल, काला तिल और गुड़ भैरव को प्रिय हैं। भैरव अष्टमी (कार्तिक कृष्ण अष्टमी) इनका प्रमुख पर्व है।
पूजन सामग्री: काले फूल, काला वस्त्र, धूप-दीप, नारियल, गुड़, काली मिर्च, सरसों का तेल
मंत्र: “ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं”
अष्ट भैरव यात्रा: एक आध्यात्मिक अनुभव
तमिलनाडु में सात भैरव मंदिरों की यात्रा को ‘भैरव परिक्रमा’ कहा जाता है। यह यात्रा अत्यंत फलदायी मानी जाती है। तिरुवनलूर, तिरुविदैमरुदुर, सत्थानाथर, वैदीश्वरन कोइल, तिरुवेनकाडु और रामेश्वरम के भैरव मंदिरों में दर्शन करने से साधक को अष्ट सिद्धियों की प्राप्ति हो सकती है।
भैरव: शक्तिपीठों के संरक्षक
प्रत्येक शक्तिपीठ में एक भैरव विराजमान हैं जो उस पीठ की रक्षा करते हैं। उदाहरण के लिए, कामाख्या में उमानंद भैरव, वाराणसी में कालभैरव, और उज्जैन में भैरव बाबा मंदिर प्रसिद्ध हैं। शक्तिपीठों में माता के दर्शन के बाद भैरव के दर्शन अनिवार्य माने जाते हैं।
आधुनिक जीवन में भैरव उपासना की प्रासंगिकता
आज के तनावपूर्ण जीवन में भैरव उपासना मानसिक शांति, आत्मविश्वास और सुरक्षा का अनुभव कराती है। वास्तु दोष निवारण में भी भैरव यंत्र का प्रयोग लाभकारी है। घर या व्यवसाय स्थल की संबंधित दिशा में उस दिशा के भैरव का चित्र या यंत्र स्थापित करने से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है।
निष्कर्ष
अष्ट भैरव भगवान शिव की दिव्य शक्ति के आठ अद्भुत रूप हैं जो अष्ट दिशाओं से हमारी रक्षा करते हैं। प्रत्येक भैरव की विशिष्ट शक्तियां और कार्यक्षेत्र हैं। जीवन की किसी भी समस्या के लिए उपयुक्त भैरव की उपासना करने से निश्चित रूप से लाभ मिलता है। तमिलनाडु या वाराणसी की यात्रा के दौरान भैरव मंदिरों के दर्शन अवश्य करें। याद रखें, भैरव क्रोधी होते हुए भी अपने भक्तों के प्रति अत्यंत करुणामय हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: अष्ट भैरव कौन-कौन से हैं?
उत्तर: आठ भैरव हैं – असितांग भैरव, रुरु भैरव, चंड भैरव, क्रोध भैरव, उन्मत्त भैरव, कपाल भैरव, संहार भैरव और भीषण भैरव। प्रत्येक भैरव एक विशेष दिशा के रक्षक हैं।
प्रश्न 2: भैरव की पूजा किस समय करनी चाहिए?
उत्तर: भैरव को रात्रि का देवता माना जाता है, इसलिए उनकी पूजा रात्रि में करना सर्वोत्तम है। विशेषकर अष्टमी, चतुर्दशी और रविवार को भैरव पूजा अधिक फलदायी होती है।
प्रश्न 3: भैरव को क्या चढ़ाना चाहिए?
उत्तर: भैरव को काला तिल, सरसों का तेल, काली मिर्च, गुड़, धतूरा, बेल पत्र, नीले और काले फूल प्रिय हैं। कुत्तों को भोजन कराना भी भैरव को अत्यंत प्रिय है।
प्रश्न 4: कालभैरव और अष्ट भैरव में क्या अंतर है?
उत्तर: कालभैरव भगवान शिव का एक रुद्र रूप है जो काल के नियंत्रक हैं। अष्ट भैरव कालभैरव के ही आठ विभिन्न स्वरूप हैं जो आठ दिशाओं की रक्षा करते हैं।
प्रश्न 5: क्या महिलाएं भैरव की पूजा कर सकती हैं?
उत्तर: हां, महिलाएं निश्चित रूप से भैरव की पूजा कर सकती हैं। भैरव माता भवानी के अनुचर हैं और स्त्री-पुरुष दोनों को समान रूप से आशीर्वाद देते हैं।
प्रश्न 6: अष्ट भैरव के मंदिर कहां स्थित हैं?
उत्तर: अष्ट भैरवों में से सात के मुख्य मंदिर तमिलनाडु राज्य में स्थित हैं – तिरुवनलूर, तिरुविदैमरुदुर, सत्थानाथर, वैदीश्वरन कोइल, तिरुवेनकाडु और रामेश्वरम में। रुरु भैरव का मंदिर वाराणसी, उत्तर प्रदेश में है।
प्रश्न 7: भैरव अष्टमी कब मनाई जाती है?
उत्तर: भैरव अष्टमी कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। यह भैरव का सबसे महत्वपूर्ण पर्व है।
प्रश्न 8: किस समस्या के लिए किस भैरव की पूजा करें?
उत्तर:
- कानूनी समस्या: कपाल भैरव
- शत्रु पराजय: चंड भैरव
- ज्ञान प्राप्ति: रुरु भैरव
- मानसिक शांति: उन्मत्त भैरव
- भूत-प्रेत बाधा: भीषण भैरव
- कला में निपुणता: असितांग भैरव
- संकट मोचन: क्रोध भैरव
- कष्ट निवारण: संहार भैरव
प्रश्न 9: क्या घर में भैरव की तस्वीर रख सकते हैं?
उत्तर: हां, घर में भैरव का चित्र या यंत्र रख सकते हैं। यह नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा करता है और सकारात्मकता लाता है। इसे उचित दिशा में स्थापित करना चाहिए।
प्रश्न 10: भैरव मंत्र जाप की विधि क्या है?
उत्तर: भैरव मंत्र का जाप रात्रि में, स्वच्छ वस्त्र पहनकर, रुद्राक्ष की माला से करना चाहिए। मुख पूर्व या उत्तर दिशा में रखें। “ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं” मंत्र का 108 बार जाप करें।
हर हर महादेव! जय भैरव बाबा!