🔥 क्या होता अगर उस दिन माता पार्वती ने भगवान शिव की आँखें बंद न की होतीं? — शायद आज शिव ‘त्रिलोचन’ न कहलाते! जानिए वह अनोखी पौराणिक कथा जो बताती है कि महादेव के तीसरे नेत्र की उत्पत्ति कैसे हुई, और क्यों यह नेत्र हमेशा बंद रहता है…
🕉️ परिचय — त्रिलोचन भगवान शिव
देवों के देव — महादेव। भगवान शिव को हिंदू धर्म में सबसे शक्तिशाली और रहस्यमय देवता माना गया है। उनके तीन नेत्र उनकी सबसे विशिष्ट पहचान हैं, जिसके कारण उन्हें ‘त्रिलोचन’ और ‘त्रिनेत्रधारी’ भी कहा जाता है। जहाँ उनकी दो आँखें साधारण दृष्टि का प्रतीक हैं, वहीं तीसरा नेत्र ज्ञान, विवेक और प्रलयंकारी शक्ति का प्रतीक है।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान शिव को यह तीसरा नेत्र कैसे प्राप्त हुआ? इसके पीछे एक अत्यंत रोचक और भावुक कर देने वाली पौराणिक कथा छुपी है, जिसमें माता पार्वती की एक चुलबुली गलती ने इतिहास ही बदल दिया! आइए, विस्तार से जानते हैं इस दिव्य रहस्य को।
⭐ रोचक तथ्य: भगवान शिव को संस्कृत में ‘त्रिलोचन’ (तीन आँखों वाले), ‘त्र्यम्बक’ (तीन माताओं वाले) और ‘त्रिनेत्र’ के नाम से जाना जाता है। तीसरे नेत्र का उल्लेख ऋग्वेद के श्री रुद्र स्तोत्र में भी मिलता है।
📜 वह दिव्य कथा — जब माता पार्वती ने की शरारत
महाभारत के छठे खंड के अनुशासन पर्व में इस पावन कथा का विस्तृत वर्णन मिलता है।
एक बार की बात है — देवों के देव महादेव हिमालय पर्वत की किसी शांत शिला पर देवताओं, ऋषि-मुनियों और ज्ञानियों के साथ एक दिव्य सभा में व्यस्त थे। इस सभा में ब्रह्मांड के गूढ़ रहस्यों पर चर्चा हो रही थी।
उधर माता पार्वती काफी देर से भगवान शिव की प्रतीक्षा कर रही थीं। जब बहुत समय बीत गया और शिवजी न आए, तो माता पार्वती स्वयं हिमालय पर्वत पहुँच गईं। वहाँ उन्होंने देखा कि उनके स्वामी एक गंभीर सभा में विराजमान हैं।
माता पार्वती स्वभाव से चंचल और स्नेहमयी हैं। सभा का गांभीर्य देखकर उनके मन में एक शरारत का भाव जागा। वे चुपके-चुपके भगवान शिव के पीछे गईं और अचानक अपने दोनों कोमल हाथों से महादेव की दोनों आँखें बंद कर दीं!
🌑 जब पूरी सृष्टि में छा गया अँधेरा…
पुराणों में बताया गया है कि भगवान शिव की दाईं आँख सूर्य के समान है और बाईं आँख चंद्रमा का स्वरूप है। ये दोनों नेत्र ही इस ब्रह्मांड को प्रकाश देते हैं। जब माता पार्वती ने अपने दोनों हाथों से इन दोनों नेत्रों को ढक लिया, तो क्षण भर में ही:
➤ सूर्य का प्रकाश समाप्त हो गया
➤ चंद्रमा की शीतल चाँदनी लुप्त हो गई
➤ तीनों लोकों में घना अँधेरा फैल गया
➤ सभी जीव-जंतु भयभीत होकर छटपटाने लगे — पूरी सृष्टि में हाहाकार मच गया!
पर्वत काँपने लगे, नदियाँ रुकने लगीं, देवता भयाकुल हो उठे। सृष्टि के अस्तित्व पर संकट आ गया था।
⭐ रोचक तथ्य: शिव पुराण के अनुसार, भगवान शिव की दाईं आँख में ‘सत्वगुण’, बाईं आँख में ‘रजोगुण’ और तीसरे नेत्र में ‘तमोगुण’ का वास है। तीनों गुणों का यह समन्वय ही उन्हें त्रिगुणातीत बनाता है।
✨ तीसरे नेत्र की उत्पत्ति — एक दिव्य ज्योतिपुंज
सृष्टि की इस दयनीय अवस्था को देखकर भगवान शिव विचलित हो उठे। उनका करुणामय हृदय जीवों की पीड़ा सहन न कर सका। तब महादेव ने एक अभूतपूर्व कार्य किया — उन्होंने अपने माथे के ठीक मध्य भाग से एक अलौकिक ज्योतिपुंज प्रकट किया!
इस दिव्य ज्योति ने तत्काल ही तीनों लोकों को प्रकाशित कर दिया। सृष्टि में पुनः जीवन का संचार हुआ। जीव-जंतु शांत हुए, देवताओं ने राहत की साँस ली। इस प्रकार भगवान शिव के तीसरे नेत्र का प्राकट्य हुआ — यह नेत्र उनकी माथे पर दोनों भौंहों के बीच स्थापित हो गया।
जब माता पार्वती को अपनी गलती का बोध हुआ, तो उन्होंने तुरंत शिवजी की आँखों से अपने हाथ हटा लिए। उनकी आँखों में पश्चाताप के आँसू थे। वे बोलीं —
“स्वामी, मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मैंने जानबूझकर आपकी आँखें बंद नहीं की थीं। यदि मुझे पहले से पता होता तो मैं यह गलती भला क्यों करती? कृपा कर मुझे क्षमा कर दें।” — माता पार्वती
भगवान शिव ने माता पार्वती की बातें सुनीं और अपने स्नेहिल स्वभाव के अनुरूप उन्हें तुरंत क्षमा कर दिया। इसके पश्चात् महादेव ने उस ज्योतिपुंज को अपना तीसरा नेत्र बना लिया। उसी दिन से भगवान शिव ‘त्रिलोचन’ कहलाने लगे।
🔱 तीसरे नेत्र का आध्यात्मिक महत्व
भगवान शिव का तीसरा नेत्र केवल एक आँख नहीं है — यह अनंत शक्ति, परम ज्ञान और ब्रह्मांडीय चेतना का प्रतीक है। वेद-शास्त्रों के अनुसार इस तीसरे नेत्र के कई अर्थ हैं:
🔸 विवेक का प्रतीक: जहाँ दो आँखें स्थूल जगत को देखती हैं, वहीं तीसरा नेत्र सत्य और असत्य का भेद करने वाला विवेकचक्षु है।
🔸 प्रलय का द्वार: जब यह नेत्र खुलता है, तो उससे निकलने वाली अग्नि कुछ भी नहीं छोड़ती। यही कारण है कि भगवान शिव सदैव इसे बंद रखते हैं।
🔸 आज्ञाचक्र का प्रतीक: योग विज्ञान में तीसरे नेत्र का स्थान आज्ञाचक्र (भौंहों के बीच) में माना गया है। यही स्थान मनुष्य की अंतरात्मा और परमात्मा के मिलन का बिंदु है।
🔸 त्रिगुण का समन्वय: दाईं आँख (सत्वगुण) + बाईं आँख (रजोगुण) + तीसरा नेत्र (तमोगुण) — इन तीनों का संगम शिव को त्रिगुणातीत बनाता है।
⚡ कब-कब खुला शिवजी का तीसरा नेत्र?
भगवान शिव ने अपना तीसरा नेत्र कभी-कभी ही खोला है, और जब भी खोला है — सृष्टि काँप उठी है। यहाँ दो सबसे प्रसिद्ध प्रसंग हैं:
1. कामदेव का भस्म होना
माता सती के देहांत के बाद भगवान शिव गहरी तपस्या में लीन हो गए। तब देवताओं ने माता पार्वती (सती का पुनर्जन्म) से शिव का विवाह कराने के लिए कामदेव की सहायता ली। कामदेव ने आम के पेड़ की आड़ से अपना ‘पुष्प-प्रेम बाण’ चलाया जो सीधे महादेव के हृदय में जा लगा।
भगवान शिव का ध्यान भंग हुआ और वे क्रोध से भर उठे। उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोला और उस अग्नि से कामदेव तत्काल भस्म हो गए। देवताओं को खुशी थी कि शिव का ध्यान टूटा, लेकिन कामदेव की पत्नी रति का क्रंदन सुनकर भगवान शिव ने वचन दिया कि कामदेव द्वापरयुग में श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में पुनर्जन्म लेंगे।
2. त्रिपुरासुर का संहार
तीनों लोकों को आतंकित करने वाले असुर त्रिपुरासुर को जब किसी देव का अस्त्र-शस्त्र नहीं मार सका, तब सभी देवता भगवान शिव की शरण में आए। महादेव ने एकमात्र बाण से तीनों पुरों का नाश किया और साथ ही अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से त्रिपुरासुर को भस्म कर दिया। इसीलिए शिव को ‘त्रिपुरांतक’ भी कहते हैं।
⭐ रोचक तथ्य: भगवान शिव का तीसरा नेत्र भौंहों के बीच स्थित होता है जिसे ‘आज्ञाचक्र’ कहते हैं। आधुनिक विज्ञान में यही स्थान ‘पीनियल ग्रंथि’ का है, जिसे ‘थर्ड आई’ भी कहा जाता है। यह ग्रंथि मेलाटोनिन हार्मोन का निर्माण करती है और अंतर्ज्ञान से संबंधित मानी जाती है।
💫 माता पार्वती की गलती में छुपा दिव्य संदेश
माता पार्वती द्वारा की गई यह शरारत भले ही अनजाने में हुई थी, लेकिन इसने एक महत्वपूर्ण सत्य उजागर किया — सृष्टि का संचालन भगवान शिव की चेतना से ही होता है। जब वह चेतना क्षण भर के लिए भी बाधित होती है, तो समस्त जगत अस्त-व्यस्त हो जाता है।
यह कथा यह भी सिखाती है कि ईश्वर की करुणा कितनी अपार है। महादेव ने माता पार्वती को तुरंत क्षमा कर दिया और उस संकट को भी एक वरदान में बदल दिया — तीसरे नेत्र के रूप में। यही शिव की महानता है।
🧘 तीसरे नेत्र का योग-विज्ञान में महत्व
शिव के तीसरे नेत्र की संकल्पना केवल पौराणिक नहीं है — यह गहन आध्यात्मिक विज्ञान का हिस्सा है। हठयोग और तंत्र विद्या में बताया गया है कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर भी एक ‘तीसरी आँख’ होती है। जब साधक ध्यान के माध्यम से अपने आज्ञाचक्र को जागृत करता है, तो उसे भी अनुभव होता है — जैसे एक नया प्रकाश उदित हो रहा है।
इसीलिए शिव को ‘आदियोगी’ — प्रथम योगी — कहा जाता है। उनका तीसरा नेत्र हमें यह संदेश देता है कि यदि हम अपने विवेक को जागृत करें, तो हम भी माया के अँधेरे से बाहर निकल सकते हैं।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्र.1: भगवान शिव के तीसरे नेत्र की उत्पत्ति कैसे हुई?
उ: महाभारत के अनुशासन पर्व के अनुसार, एक बार माता पार्वती ने शरारत में भगवान शिव की दोनों आँखें अपने हाथों से बंद कर दीं। चूँकि शिव की आँखें ही सूर्य और चंद्रमा हैं, पूरी सृष्टि में अंधकार छा गया। तब शिव ने अपने माथे के मध्य से एक ज्योतिपुंज प्रकट किया, जो बाद में उनका तीसरा नेत्र बन गया।
प्र.2: भगवान शिव का तीसरा नेत्र कहाँ स्थित है?
उ: भगवान शिव का तीसरा नेत्र उनके मस्तक पर, दोनों भौंहों के बीच में स्थित है। इसे ‘आज्ञाचक्र’ का स्थान भी कहते हैं। यह नेत्र हमेशा बंद रहता है और केवल अत्यधिक क्रोध या आवश्यकता पड़ने पर ही खुलता है।
प्र.3: शिवजी का तीसरा नेत्र क्यों बंद रहता है?
उ: भगवान शिव का तीसरा नेत्र प्रलयंकारी शक्ति का स्रोत है। जब यह खुलता है, तो इससे निकलने वाली अग्नि से कुछ भी नहीं बचता। इसीलिए महादेव इसे सदैव बंद रखते हैं — यह उनकी करुणा और संयम का प्रतीक है। वे इसे केवल तब खोलते हैं जब सृष्टि में अधर्म बहुत बढ़ जाए।
प्र.4: शिव के तीसरे नेत्र से किसे भस्म किया गया?
उ: भगवान शिव के तीसरे नेत्र से सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रसंग है — कामदेव का भस्म होना। जब कामदेव ने देवताओं के कहने पर शिव का ध्यान भंग किया, तो क्रुद्ध महादेव ने तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को भस्म कर दिया। इसके अलावा त्रिपुरासुर संहार में भी तीसरे नेत्र का प्रयोग हुआ।
प्र.5: भगवान शिव को त्रिलोचन क्यों कहते हैं?
उ: संस्कृत में ‘त्रि’ का अर्थ है तीन और ‘लोचन’ का अर्थ है नेत्र/आँख। चूँकि भगवान शिव के तीन नेत्र हैं — दाईं आँख (सूर्य), बाईं आँख (चंद्रमा) और तीसरा नेत्र (अग्नि/विवेक) — इसलिए उन्हें ‘त्रिलोचन’ कहा जाता है। इसीलिए उन्हें ‘त्रिनेत्रधारी’ और ‘त्र्यम्बक’ भी कहते हैं।
प्र.6: शिव के तीन नेत्रों का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?
उ: शिव पुराण के अनुसार — दाईं आँख सत्वगुण और भूत-भविष्य-वर्तमान की दृष्टि देती है। बाईं आँख रजोगुण और भावनात्मक संसार का प्रतिनिधित्व करती है। तीसरा नेत्र तमोगुण, ज्ञान-विवेक और परम सत्य को देखने की शक्ति है। एक साथ ये तीन नेत्र ब्रह्मा (सृष्टि), विष्णु (पालन) और शिव (संहार) के भी प्रतीक हैं।
🔚 निष्कर्ष
भगवान शिव का तीसरा नेत्र — त्रिलोचन का वह दिव्य नयन — केवल एक पौराणिक कथा नहीं है, बल्कि यह हमें जीवन की एक गहरी सीख देता है। माता पार्वती की एक छोटी-सी शरारत ने जहाँ सृष्टि को संकट में डाला, वहीं भगवान शिव ने उसी संकट को एक वरदान में बदल दिया।
यह नेत्र हमें याद दिलाता है कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर भी एक ‘तीसरी आँख’ है — विवेक की आँख। जिस दिन हम अपना विवेक जागृत कर लेंगे, उस दिन हम भी माया के अँधकार से मुक्त हो जाएंगे।
हर हर महादेव! 🙏
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