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शिवलिंग पर पैर रखने वाले भक्त की अद्भुत कहानी: कन्नप्पा नयनार का अपार प्रेम

क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान शिव अपने भक्तों से क्या चाहते हैं? क्या सिर्फ विधि-विधान और मंत्र-तंत्र? या फिर सच्ची भक्ति कुछ और है? आज हम आपको एक ऐसे भक्त की कहानी सुनाने जा रहे हैं, जिसने शिवलिंग पर अपने पैर रखे, मांस चढ़ाया, और अपने मुंह का जल शिवलिंग पर डाला। फिर भी भगवान भोलेनाथ ने न केवल उसे क्षमा किया, बल्कि उसे अपने सबसे प्रिय भक्तों में से एक मान लिया। यह है कन्नप्पा नयनार की अमर कथा, जो हमें सिखाती है कि भोलेपन से की गई भक्ति, हजारों विधि-विधानों से बड़ी होती है।

कन्नप्पा नयनार कौन थे?

कन्नप्पा नयनार दक्षिण भारत के एक साधारण शिकारी थे, जो अपने समय के सबसे महान शैव संतों में से एक बन गए। उनका वास्तविक नाम तिन्नन था और वे तमिलनाडु के उदुप्पी क्षेत्र के निकट रहते थे। उनकी कथा 63 नयनारों (शिव के महान भक्तों) में सबसे प्रेरणादायक मानी जाती है।

संत सेक्किलार द्वारा रचित “पेरिय पुराणम” में कन्नप्पा नयनार की कथा विस्तार से वर्णित है। यह ग्रंथ 12वीं शताब्दी में तमिल भाषा में लिखा गया था और शैव धर्म का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है।

जंगल में शिवलिंग की खोज

तिन्नन एक कुशल शिकारी था जो अपने साथियों के साथ जंगलों में घूमता था। एक दिन शिकार के दौरान वह घने जंगल में भटक गया और वहां उसे एक प्राचीन मंदिर मिला। मंदिर की दीवारें टूटी हुई थीं, चारों ओर जंगली पौधे उग आए थे, लेकिन बीच में एक अत्यंत सुंदर श्री काळहस्ती शिवलिंग विराजमान था।

शिवलिंग को देखते ही तिन्नन के हृदय में एक अद्भुत प्रेम उमड़ पड़ा। यह प्रेम किसी शास्त्र का ज्ञान नहीं था, बल्कि आत्मा की पुकार थी। उसने सोचा – “यह देवता यहां अकेले हैं, इन्हें भोजन की आवश्यकता होगी।”

रोचक तथ्य:

जिस स्थान पर कन्नप्पा नयनार ने शिवलिंग की खोज की, वह आज श्री काळहस्ती मंदिर (आंध्र प्रदेश) के नाम से प्रसिद्ध है। यह मंदिर पंच भूत स्थलों में से एक है, जो वायु तत्व का प्रतिनिधित्व करता है।

शिकारी की अनोखी पूजा

तिन्नन को पूजा-विधि का कोई ज्ञान नहीं था। उसके पास न तो पवित्र जल था, न फूल, न धूप-दीप। उसके पास तो केवल शिकार किया हुआ मांस था। लेकिन उसका हृदय प्रेम से भरा था।

उसने अपनी सरलता में सोचा:

  • भोजन: मैं जो खाता हूं, वही अपने प्रभु को अर्पित करूंगा
  • जल: पास के झरने से मुंह में भरकर लाऊंगा (क्योंकि कोई पात्र नहीं था)
  • फूल: जंगली फूल तोड़कर अर्पित करूंगा

तिन्नन रोज शिकार से लौटते समय सबसे अच्छा मांस, ताजे फल और जंगली फूल शिवलिंग पर चढ़ाने लगा। वह शिवलिंग के पास की घास और पत्तियां साफ करता।

ब्राह्मण पुजारी का क्रोध

उस मंदिर की देखरेख एक विद्वान ब्राह्मण करता था, जो शिवगोचरियार नाम से जाना जाता था। वह हर पंद्रह दिन में एक बार वैदिक विधि-विधान से शिवलिंग की पूजा करने आता था।

जब ब्राह्मण ने शिवलिंग पर मांस, मुंह का जल, और पैरों के निशान देखे, तो वह क्रोधित हो गया। उसने सोचा – “यह कैसा पाप है! किसी अज्ञानी ने शिवलिंग को अपवित्र कर दिया है।”

ब्राह्मण ने पूरे मंदिर को गंगाजल से शुद्ध किया, वैदिक मंत्रों का जाप किया, और विधिवत पूजा की। लेकिन अगले दिन फिर वही दृश्य! शिवलिंग पर मांस और झूठा जल।

यह सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा।

धार्मिक दृष्टिकोण:

शास्त्रों में कहा गया है – “न देवतापूजा विधिना, किंतु भावेन पूज्यते” (देवता की पूजा केवल विधि से नहीं, बल्कि भाव से होती है)। यह कथा इसी सिद्धांत को प्रमाणित करती है।

भगवान शिव का स्वप्न

एक रात ब्राह्मण की नींद में भगवान शिव प्रकट हुए। उन्होंने कहा:

“हे ब्राह्मण! जिसे तुम अपवित्रता समझ रहे हो, वह मेरे सबसे प्रिय भक्त की सेवा है। वह शिकारी मुझे अपना सब कुछ अर्पित करता है – अपना भोजन, अपना जल, अपनी सफाई। उसका प्रेम निष्कलंक है, उसकी भक्ति निस्वार्थ है।

यदि तुम उसकी भक्ति की गहराई देखना चाहते हो, तो कल प्रातः मंदिर के पास झाड़ियों में छिप जाओ। तुम्हें सच्ची भक्ति का दर्शन होगा।”

ब्राह्मण अगले दिन मंदिर के पास छिपकर बैठ गया।

नेत्र दान की अमर कथा

सुबह होते ही तिन्नन हमेशा की तरह मांस और फूलों के साथ आया। लेकिन जैसे ही उसने शिवलिंग को देखा, वह चिंतित हो गया। शिवलिंग की दाहिनी आंख से रक्त बह रहा था!

तिन्नन व्याकुल हो उठा। उसने सोचा – “मेरे प्रभु को चोट लग गई है!”

उसने तुरंत जड़ी-बूटियां पीसीं और शिवलिंग की आंख पर लगाईं। लेकिन रक्तस्राव बंद नहीं हुआ। आखिरकार उसने निर्णय लिया – वह अपनी आंख शिवजी को देगा!

उसने अपना चाकू निकाला और बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी दाहिनी आंख निकालकर शिवलिंग पर रख दी। चमत्कारिक रूप से रक्तस्राव रुक गया।

परम त्याग की परीक्षा

भगवान शिव यह देखना चाहते थे कि उनके भक्त की भक्ति कितनी गहरी है। कुछ क्षणों बाद शिवलिंग की बाईं आंख से भी रक्त बहने लगा।

तिन्नन ने तुरंत अपनी दूसरी आंख भी देने का निर्णय लिया। लेकिन एक समस्या थी – दूसरी आंख निकालने के बाद वह अंधा हो जाएगा। फिर उसे कैसे पता चलेगा कि शिवलिंग की बाईं आंख कहां है?

उसे एक युक्ति सूझी। उसने अपने पैर का अंगूठा शिवलिंग की बाईं आंख पर रखा (जिससे उसे स्थान का पता रहे) और दूसरी आंख निकालने के लिए चाकू उठाया।

महत्वपूर्ण प्रतीकवाद:

कन्नप्पा का शिवलिंग पर पैर रखना सामान्यतः अपमान माना जाता है, लेकिन यहां यह सर्वोच्च भक्ति का प्रतीक बन गया। यह दर्शाता है कि भगवान क्रिया को नहीं, बल्कि उसके पीछे की भावना को देखते हैं।

भगवान शिव का प्रकट होना

जैसे ही तिन्नन अपनी दूसरी आंख निकालने वाला था, भगवान शिव साक्षात प्रकट हो गए। उन्होंने तिन्नन का हाथ पकड़ लिया और कहा:

“बस! बस! मेरे प्रिय भक्त! तुम्हारी भक्ति की परीक्षा पूर्ण हो गई। आज से तुम ‘कन्नप्पा नयनार’ के नाम से जाने जाओगे।”

“कन्न” का अर्थ है “आंख” और “अप्पा” का अर्थ है “पिता” या “प्रिय”नयनार शिव भक्तों को कहा जाता है।

भगवान शिव ने कन्नप्पा को आशीर्वाद दिया और उनकी दोनों आंखें वापस आ गईं। साथ ही उन्हें दिव्य दृष्टि का वरदान भी मिला।

झाड़ियों में छिपा ब्राह्मण यह सब देखकर अभिभूत हो गया। वह तुरंत बाहर आया और कन्नप्पा के चरणों में गिर पड़ा, क्योंकि उसने समझ लिया था कि सच्ची भक्ति विधि-विधान से नहीं, बल्कि प्रेम और समर्पण से होती है।

कन्नप्पा नयनार की शिक्षाएं

1. भक्ति में भाव सर्वोपरि है

कन्नप्पा को शास्त्रों का ज्ञान नहीं था, लेकिन उनके हृदय में शिव के प्रति अगाध प्रेम था। यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान हमारी भावना को देखते हैं, न कि हमारे कर्मकांड को।

2. निस्वार्थ सेवा

कन्नप्पा ने कभी कुछ मांगा नहीं। वे केवल अपने प्रभु की सेवा करना चाहते थे। यही सच्ची भक्ति है।

3. त्याग की महिमा

अपनी आंखें तक दान कर देना – यह परम त्याग का उदाहरण है। भक्ति में कोई गणना नहीं होती।

4. सामाजिक भेदभाव से परे

कन्नप्पा एक साधारण शिकारी थे, लेकिन भगवान ने उन्हें अपना सबसे प्रिय भक्त माना। यह दर्शाता है कि भगवान के दरबार में कोई जाति-पाति नहीं।

आधुनिक समय में प्रासंगिकता

आज के युग में जब धर्म केवल दिखावा बन गया है, कन्नप्पा नयनार की कथा हमें याद दिलाती है कि:

  • सच्ची भक्ति दिल से होती है, मंदिरों की रस्मों से नहीं
  • प्रेम में कोई नियम नहीं होते – भगवान हमारे इरादे देखते हैं
  • त्याग बिना भक्ति अधूरी है – हमें कुछ देना सीखना होगा
  • ज्ञान से बड़ा प्रेम है – पढ़े-लिखे ब्राह्मण से अनपढ़ शिकारी की भक्ति श्रेष्ठ थी

श्री काळहस्ती मंदिर: कन्नप्पा की तपोभूमि

आज भी आंध्र प्रदेश के श्री काळहस्ती मंदिर में कन्नप्पा नयनार की स्मृति में विशेष पूजा होती है। इस मंदिर में:

  • राहु-केतु दोष निवारण की विशेष प्रसिद्धि है
  • मंदिर में हमेशा एक दीपक जलता रहता है जो हवा में भी नहीं बुझता
  • कन्नप्पा नयनार की एक भव्य मूर्ति स्थापित है

रोचक तथ्य:

काळहस्ती का अर्थ है – काळ (मकड़ी) + हस्ती (हाथी) + ती (सर्प)। कहा जाता है कि इन तीन जीवों ने भी यहां शिवलिंग की पूजा की थी।

अन्य नयनारों में कन्नप्पा का स्थान

तमिल शैव परंपरा में 63 नयनार हैं, जिनमें से प्रमुख हैं:

  1. सुंदरर
  2. अप्पर
  3. तिरुज्ञान सम्बंदर
  4. कन्नप्पा नयनार

कन्नप्पा को “भक्ति का सर्वोच्च उदाहरण” माना जाता है क्योंकि उन्होंने अपनी आंखें तक दान कर दीं।

कन्नप्पा स्तोत्रम्

कन्नप्पा नयनार की स्तुति में कई स्तोत्र रचे गए हैं। एक प्रसिद्ध श्लोक:

“कन्नप्पा नयनारस्य कथा परमपावनी।
श्रुत्वा भक्तिः प्रवर्धते, पापं नश्यति तत्क्षणम्।।”

(कन्नप्पा नयनार की कथा अत्यंत पवित्र है। इसे सुनने से भक्ति बढ़ती है और पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं।)

निष्कर्ष

कन्नप्पा नयनार की कथा हमें यह संदेश देती है कि भगवान रूप नहीं, रूह देखते हैं। शिवलिंग पर पैर रखना, मांस चढ़ाना, और मुंह का जल डालना – ये सब सामान्यतः अपमान माने जाते हैं। लेकिन जब इनके पीछे निष्कलंक प्रेम हो, तो भगवान भोलेनाथ इन्हें सबसे बड़ी पूजा मान लेते हैं।

यह कथा हमें सिखाती है कि धर्म का सार प्रेम, त्याग और समर्पण में है, न कि केवल कर्मकांडों में। अगली बार जब आप मंदिर जाएं, तो याद रखें – आपके दिल में जो भाव है, वही असली पूजा है।

जय कन्नप्पा नयनार! हर हर महादेव!


FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

1. कन्नप्पा नयनार कौन थे?

कन्नप्पा नयनार दक्षिण भारत के एक शिकारी थे जो भगवान शिव के सबसे प्रिय भक्तों में से एक बन गए। उनका वास्तविक नाम तिन्नन था। उन्होंने अपनी दोनों आंखें शिवजी को अर्पित कर दीं, जिसके कारण उन्हें “कन्नप्पा” (आंख देने वाला) नाम मिला।

2. कन्नप्पा ने शिवलिंग पर पैर क्यों रखा?

कन्नप्पा ने अपने पैर का अंगूठा इसलिए शिवलिंग पर रखा था ताकि वे दूसरी आंख निकालने के बाद भी शिवलिंग की आंख की सही जगह का पता लगा सकें। यह उनकी भोलेपन भरी भक्ति का प्रतीक था, न कि अपमान का।

3. क्या कन्नप्पा की कथा सत्य है?

यह कथा पेरिय पुराणम् (12वीं शताब्दी) और शैव सिद्धांत ग्रंथों में वर्णित है। यह 63 नयनारों की कथाओं में से एक है और दक्षिण भारतीय शैव परंपरा में अत्यंत पवित्र मानी जाती है। श्री काळहस्ती मंदिर इस कथा का प्रमाण माना जाता है।

4. कन्नप्पा ने शिवलिंग पर मांस क्यों चढ़ाया?

कन्नप्पा एक अनपढ़ शिकारी थे जिन्हें पूजा-विधि का ज्ञान नहीं था। उन्होंने अपने पास उपलब्ध सबसे अच्छी चीज – ताजा शिकार का मांस – अपने प्रभु को प्रेम से अर्पित किया। भगवान शिव ने उनकी भावना को स्वीकार किया, न कि वस्तु को।

5. कन्नप्पा मंदिर कहां स्थित है?

कन्नप्पा नयनार से जुड़ा प्रमुख मंदिर श्री काळहस्ती मंदिर है, जो आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में स्थित है। यह पंच भूत स्थलों में से एक है और वायु तत्व का प्रतिनिधित्व करता है।

6. कन्नप्पा की कथा से हमें क्या शिक्षा मिलती है?

कन्नप्पा की कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति में विधि-विधान से ज्यादा महत्वपूर्ण है – प्रेम, निष्ठा और समर्पण। भगवान हमारे हृदय की भावना देखते हैं, न कि हमारे बाहरी कर्मकांडों को।

7. क्या शिवलिंग पर पैर रखना पाप नहीं है?

सामान्य परिस्थितियों में शिवलिंग पर पैर रखना अनुचित माना जाता है। लेकिन कन्नप्पा के मामले में, उनकी भावना पूर्णतः पवित्र थी – वे अपनी आंख शिवजी को देने के लिए स्थान चिह्नित कर रहे थे। भगवान इरादे देखते हैं, कार्य नहीं।

8. नयनार कौन होते हैं?

नयनार दक्षिण भारत के 63 महान शैव संत हैं जो 6वीं से 9वीं शताब्दी के बीच हुए। उन्होंने अपने जीवन और रचनाओं से शैव भक्ति आंदोलन को बल दिया। कन्नप्पा इन 63 नयनारों में से एक हैं।

9. क्या कन्नप्पा को दिव्य दृष्टि मिली थी?

हां, भगवान शिव ने न केवल कन्नप्पा की आंखें वापस कीं, बल्कि उन्हें दिव्य दृष्टि का वरदान भी दिया। इसके बाद वे एक महान संत बन गए और उनकी गणना 63 नयनारों में होती है।

10. कन्नप्पा नयनार की जयंती कब मनाई जाती है?

कन्नप्पा नयनार की जयंती तमिल महीने के कार्तिगई (नवंबर-दिसंबर) में बहुलाष्टमी के दिन मनाई जाती है। इस दिन श्री काळहस्ती मंदिर में विशेष पूजा और उत्सव होता है।


लेखक का संदेश: यह कथा हमें याद दिलाती है कि धर्म का मूल है प्रेम, न कि दिखावा। कन्नप्पा नयनार की तरह अप

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