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श्री कृष्ण द्वारा रुक्मिणी हरण की सम्पूर्ण कहानी

श्री कृष्ण द्वारा रुक्मिणी हरण की सम्पूर्ण कहानी | Rukmini Haran

क्या आप जानते हैं कि भगवान श्री कृष्ण ने अपनी पत्नी रुक्मिणी से राक्षस विधि से विवाह क्यों किया?

यह प्रेम और साहस की वह अद्भुत कथा है जिसमें स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने समस्त राजाओं की उपस्थिति में देवी रुक्मिणी का हरण किया था। यह घटना हिंदू पौराणिक इतिहास के सबसे रोमांचक और प्रेरणादायक प्रसंगों में से एक है।

देवी रुक्मिणी – स्वयं लक्ष्मी जी का अवतार

भागवत पुराण के दशम स्कंध में वर्णित इस कथा के अनुसार, देवी रुक्मिणी विदर्भ नरेश राजा भीष्मक की पुत्री थीं। वे केवल सामान्य राजकुमारी नहीं थीं, बल्कि स्वयं भगवती लक्ष्मी जी का अवतार थीं। उनका सौंदर्य, बुद्धिमत्ता, उदारता और गुणों की महिमा तीनों लोकों में प्रसिद्ध थी।

रुक्मिणी और कृष्ण का दिव्य प्रेम

जब देवी रुक्मिणी ने अपने महल में आने वाले अतिथियों से भगवान श्री कृष्ण के अद्भुत सौंदर्य, अपार पराक्रम, दिव्य गुणों और अतुलनीय वैभव की प्रशंसा सुनी, तो उनके हृदय में एक निश्चय दृढ़ हो गया – श्री कृष्ण ही उनके योग्य पति हैं।

भगवान श्री कृष्ण भी रुक्मिणी के सुंदर लक्षणों, परम बुद्धिमत्ता और अद्वितीय गुणों से परिचित थे। दोनों के मन में एक दूसरे के प्रति सच्चा प्रेम और आदर था।

रुक्मी का विरोध – एक बड़ा विघ्न

यद्यपि रुक्मिणी के अधिकांश भाई-बंधु उनका विवाह श्री कृष्ण से करना चाहते थे, परंतु उनके ज्येष्ठ भ्राता रुक्मी श्री कृष्ण से घोर द्वेष रखते थे। रुक्मी ने अपने व्यक्तिगत शत्रुता के कारण इस विवाह को रोक दिया और चेदी नरेश शिशुपाल को अपनी बहन का वर चुना।

रोचक तथ्य:

  • शिशुपाल श्री कृष्ण का मामेरा भाई था और उनका कट्टर शत्रु भी।
  • रुक्मी ने अपने पिता राजा भीष्मक की इच्छा के विरुद्ध यह निर्णय लिया था।

रुक्मिणी का साहसिक कदम – प्रेम पत्र

जब देवी रुक्मिणी को ज्ञात हुआ कि उनका विवाह शिशुपाल से तय हो चुका है, तो वे अत्यंत व्याकुल हो गईं। परंतु उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने एक अत्यंत साहसिक निर्णय लिया – एक विश्वासपात्र ब्राह्मण के माध्यम से भगवान श्री कृष्ण को संदेश भेजा।

रुक्मिणी के संदेश की मुख्य बातें:

“हे अंतर्यामी प्रभु, मैंने आपको ही अपने पति के रूप में वरण किया है। मैं आपको आत्मसमर्पण करती हूं। मेरे हृदय की बात आपसे छिपी नहीं है।”

रुक्मिणी ने अपने संदेश में यह भी बताया कि विवाह से एक दिन पूर्व वे देवी के दर्शन के लिए मंदिर जाएंगी। उन्होंने श्री कृष्ण से निवेदन किया कि वे उसी समय आकर उनका हरण कर लें और राक्षस विधि से विवाह रचाएं।

रोचक तथ्य:

  • राक्षस विवाह क्षत्रियों के लिए मान्य आठ प्रकार के विवाहों में से एक था।
  • इस विधि में वर, कन्या का बलपूर्वक हरण करके उससे विवाह करता था।

श्री कृष्ण का द्वारका से प्रस्थान

जब ब्राह्मण देवता द्वारका पहुंचे, तो भगवान श्री कृष्ण ने उनका विधिवत सम्मान किया। रुक्मिणी का संदेश सुनकर श्री कृष्ण ने तत्काल कहा:

“मैं भी उन्हें उतना ही चाहता हूं जितना वे मुझे चाहती हैं। मैं युद्ध में उन नामधारी क्षत्रियों को पराजित करके अपनी प्रिय राजकुमारी को ले आऊंगा।”

भगवान श्री कृष्ण उसी रात्रि अपने शीघ्रगामी अश्वों के साथ विदर्भ की राजधानी कुंडिनपुर पहुंच गए।

विरोधियों का सैन्य संगठन

इधर शिशुपाल की बारात में अनेक शक्तिशाली राजा सम्मिलित हुए:

  • मगध नरेश जरासंध
  • शाल्व
  • दंतवक्र
  • विदुरथ
  • पौंड्रक

ये सभी राजा श्री कृष्ण के विरोधी थे और विशाल चतुरंगिणी सेना लेकर आए थे।

बलराम जी की तैयारी

जब भगवान बलराम को ज्ञात हुआ कि श्री कृष्ण अकेले ही गए हैं, तो भ्रातृ-प्रेमवश उनका हृदय व्याकुल हो उठा। यद्यपि वे श्री कृष्ण के अपार बल से परिचित थे, फिर भी वे विशाल सेना लेकर कुंडिनपुर की ओर प्रस्थान कर गए।

देवी मंदिर में प्रार्थना

विवाह के दिन, रुक्मिणी जी अपनी सखियों के साथ देवी मंदिर पहुंचीं। उन्होंने भगवती से हृदय से प्रार्थना की:

“हे अंबिका माता, आपको और आपके प्रिय पुत्र गणेश जी को मैं बार-बार नमस्कार करती हूं। मेरी यही अभिलाषा है कि भगवान श्री कृष्ण मेरे पति बनें।”

ऐतिहासिक हरण – साहस और पराक्रम का प्रदर्शन

मंदिर से लौटते समय जब रुक्मिणी विवाह स्थल की ओर बढ़ रही थीं, तो उनके अद्भुत सौंदर्य को देखकर उपस्थित समस्त राजाओं के हाथों से अस्त-शस्त्र छूट गए।

ठीक उसी क्षण, भगवान श्री कृष्ण ने अद्भुत पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए समस्त शत्रुओं की उपस्थिति में रुक्मिणी को उठाया और अपने रथ पर बैठा लिया।

रोचक तथ्य:

  • यह घटना दिन के उजाले में, सैकड़ों राजाओं और हजारों सैनिकों की उपस्थिति में घटी।
  • किसी को श्री कृष्ण को रोकने का साहस नहीं हुआ।

भीषण युद्ध

अपने अपमान से क्रोधित होकर जरासंध और अन्य राजाओं ने यदुवंशियों पर आक्रमण कर दिया। बाणों की वर्षा होने लगी।

रुक्मिणी जी जब भयभीत नेत्रों से श्री कृष्ण की ओर देखा, तो भगवान ने मुस्कुराते हुए कहा:

“सुंदरी, भयभीत मत हो। हमारी सेना शीघ्र ही तुम्हारे शत्रुओं का विनाश कर देगी।”

बलराम, गद, संकर्षण और अन्य यदुवंशी वीरों ने शत्रु सेना को तहस-नहस कर दिया। जरासंध सहित सभी राजा युद्ध से पलायन कर गए।

जरासंध का दार्शनिक उपदेश

पराजय के बाद जरासंध ने निराश शिशुपाल को समझाया:

“प्रारब्ध के अनुसार ही सब होता है। मुझे श्री कृष्ण ने 17 बार पराजित किया, परंतु मैं न कभी शोक करता हूं और न हर्ष।”

रुक्मी का अपमान

रुक्मी ने अपनी बहन का हरण सहन नहीं किया। उसने एक अक्षौहिणी सेना लेकर श्री कृष्ण का पीछा किया। युद्ध में श्री कृष्ण ने उसका धनुष, ढाल और तलवार काट डाली।

जब श्री कृष्ण रुक्मी को मारने के लिए तत्पर हुए, तो रुक्मिणी ने विनती की:

“हे जगतपते, आप योगेश्वर हैं। मेरे भाई को मारना आपके योग्य नहीं है।”

श्री कृष्ण ने रुक्मी को जीवनदान दे दिया, परंतु उसे अपमानित करने के लिए उसकी दाढ़ी, मूंछ और केश कई स्थानों से मुंडवा दिए।

रोचक तथ्य:

  • रुक्मी ने प्रतिज्ञा की थी कि श्री कृष्ण को मारे बिना वह कुंडिनपुर नहीं लौटेगा।
  • अपमानित होकर उसने भोजकट नामक नई नगरी बसाई और वहीं रहने लगा।

द्वारका में भव्य विवाह

भगवान श्री कृष्ण ने रुक्मिणी को द्वारका लाकर विधिपूर्वक विवाह रचाया। यह विवाह अत्यंत भव्य और दिव्य था।

रुक्मिणी-कृष्ण के पुत्र

देवी रुक्मिणी के गर्भ से दस पुत्रों का जन्म हुआ:

  1. प्रद्युम्न (सबसे ज्येष्ठ और कामदेव के अवतार)
  2. चारुदेष्ण
  3. सुदेष्ण
  4. चारुदेह
  5. सुचारु
  6. चारुगुप्त
  7. भद्रचारु
  8. चारुचंद्र
  9. विचारु
  10. चारु

इनके अतिरिक्त एक पुत्री चारुमति का भी जन्म हुआ।

रोचक तथ्य:

  • प्रद्युम्न को कामदेव का अवतार माना जाता है।
  • रुक्मिणी श्री कृष्ण की पटरानी (प्रथम पत्नी) थीं।

इस कथा से मिलने वाली शिक्षाएं

  1. सच्चे प्रेम की विजय: रुक्मिणी और कृष्ण की कथा बताती है कि सच्चा प्रेम हर बाधा को पार कर लेता है।
  2. साहस और निर्णय: रुक्मिणी का साहसिक निर्णय यह सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी अपने मन की बात रखनी चाहिए।
  3. धर्म की रक्षा: भगवान श्री कृष्ण ने रुक्मिणी को अधर्मी शिशुपाल से बचाकर धर्म की स्थापना की।
  4. क्षमा का महत्व: रुक्मिणी की प्रार्थना पर श्री कृष्ण ने रुक्मी को जीवनदान दिया।

निष्कर्ष

श्री कृष्ण द्वारा रुक्मिणी हरण की यह कथा केवल एक पौराणिक घटना नहीं, बल्कि प्रेम, साहस, धर्म और नैतिकता का अद्भुत संगम है। यह कथा हमें सिखाती है कि सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने वालों की विजय अवश्यंभावी है।

भगवान श्री कृष्ण और देवी रुक्मिणी का यह दिव्य प्रेम आज भी भक्तों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: श्री कृष्ण ने रुक्मिणी से राक्षस विधि से विवाह क्यों किया?

उत्तर: राक्षस विधि से विवाह क्षत्रियों के लिए एक मान्य विवाह पद्धति थी। चूंकि रुक्मी ने विवाह में बाधा उत्पन्न की थी और रुक्मिणी की इच्छा के विरुद्ध शिशुपाल से विवाह तय किया था, इसलिए श्री कृष्ण ने बलपूर्वक हरण करके राक्षस विधि से विवाह किया। यह धर्मसम्मत था।

प्रश्न 2: रुक्मिणी कौन थीं?

उत्तर: रुक्मिणी विदर्भ नरेश राजा भीष्मक की पुत्री थीं और स्वयं भगवती लक्ष्मी का अवतार मानी जाती हैं। वे अत्यंत रूपवती, बुद्धिमान और गुणवती थीं। वे श्री कृष्ण की पटरानी (प्रथम पत्नी) बनीं।

प्रश्न 3: रुक्मी ने श्री कृष्ण का विरोध क्यों किया?

उत्तर: रुक्मी श्री कृष्ण से व्यक्तिगत द्वेष रखता था। वह शिशुपाल का मित्र था और जरासंध के प्रभाव में था। इसी कारण उसने अपनी बहन का विवाह शिशुपाल से करने का निर्णय लिया, अपने पिता और परिवार की इच्छा के विरुद्ध।

प्रश्न 4: रुक्मिणी हरण की घटना कहां घटी?

उत्तर: यह घटना विदर्भ देश की राजधानी कुंडिनपुर में घटी। रुक्मिणी जब देवी मंदिर से विवाह मंडप की ओर लौट रही थीं, तभी श्री कृष्ण ने समस्त राजाओं की उपस्थिति में उनका हरण किया।

प्रश्न 5: रुक्मिणी और कृष्ण के कितने पुत्र थे?

उत्तर: रुक्मिणी और श्री कृष्ण के दस पुत्र थे – प्रद्युम्न, चारुदेष्ण, सुदेष्ण, चारुदेह, सुचारु, चारुगुप्त, भद्रचारु, चारुचंद्र, विचारु और चारु। इनके अतिरिक्त एक पुत्री चारुमति भी थी। प्रद्युम्न सबसे ज्येष्ठ थे।

प्रश्न 6: जरासंध ने श्री कृष्ण से कितनी बार युद्ध किया?

उत्तर: भागवत पुराण के अनुसार, जरासंध ने श्री कृष्ण से 18 बार युद्ध किया। प्रथम 17 बार श्री कृष्ण ने उसे पराजित किया, केवल 18वीं बार जरासंध विजयी हुआ। फिर भी वह इससे न तो शोक करता था और न हर्ष।

प्रश्न 7: रुक्मी का अंत कैसे हुआ?

उत्तर: इस घटना में श्री कृष्ण ने रुक्मिणी की प्रार्थना पर रुक्मी को जीवनदान दे दिया, परंतु उसे अपमानित किया। बाद में महाभारत काल में, द्यूत क्रीड़ा के दौरान बलराम जी ने रुक्मी का वध कर दिया था।

प्रश्न 8: यह कथा किस पुराण में वर्णित है?

उत्तर: रुक्मिणी हरण की यह कथा भागवत पुराण के दशम स्कंध के अध्याय 52 और 53 में विस्तार से वर्णित है। इसके अतिरिक्त विष्णु पुराण और हरिवंश पुराण में भी इसका उल्लेख मिलता है।


अस्वीकरण: यह लेख भागवत पुराण और अन्य हिंदू धर्मग्रंथों पर आधारित है। कृपया इसे श्रद्धा और धार्मिक दृष्टिकोण से पढ़ें।

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